-
☰
No image found.
मध्य प्रदेश: बीजानगरी में आस्था का दिखा अद्भुत संगम, प्राचीन हरसिद्धि माता मंदिर में सदियों से प्रज्वलित है अखंड ज्योत
- Photo by : social media
संक्षेप
मध्य प्रदेश: आगर-मालवा जिले के बड़ौद विकासखंड से करीब 18 किलोमीटर दूर ग्राम बीजानगरी में स्थित श्री हरसिद्धि माता मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
विस्तार
मध्य प्रदेश: आगर-मालवा जिले के बड़ौद विकासखंड से करीब 18 किलोमीटर दूर ग्राम बीजानगरी में स्थित श्री हरसिद्धि माता मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित इस प्राचीन मंदिर को राज्य शासन द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर उज्जैन की प्रसिद्ध हरसिद्धि माता का दूसरा स्वरूप और उनकी छोटी बहन के रूप में पूजित है। पुरातत्व विभाग, भोपाल के सूचना पट्ट के अनुसार, मंदिर का निर्माण भूमिज शैली में किया गया है। इसकी स्थापत्य कला में घट-पल्लव आकृतियां और गर्भगृह, मंडप, शिखर एवं कलश जैसी विशेषताएं देखने को मिलती हैं। मंदिर परिसर में वामन, शेषशायी विष्णु, ब्रह्मा, लक्ष्मीनारायण, गणेश, कार्तिकेय और शिव-उमा-महेश्वर सहित कई प्राचीन प्रतिमाओं के अवशेष मिले हैं। इतिहासकारों के अनुसार, मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी में हुआ था।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मंदिर का संबंध राजा विक्रमादित्य के भानजे राजा विजय सिंह से है। कहा जाता है कि 12 वर्षों की साधना के बाद माता के स्वप्न में दिए गए आदेश पर राजा ने नदी के तट पर मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर की सबसे खास विशेषता यहां प्राचीनकाल से प्रज्वलित मानी जाने वाली अखंड ज्योत है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि तेज आंधी में भी यह ज्योत नहीं बुझती। मान्यता है कि माता की प्रतिमा सुबह बाल स्वरूप, दोपहर में युवा स्वरूप और शाम को वृद्धा स्वरूप में दिखाई देती है। मंदिर में वैष्णव परंपरा के अनुसार सात्विक पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर में मनोकामना से जुड़ी एक अनूठी परंपरा भी निभाई जाती है। श्रद्धालु अपनी इच्छा पूरी होने की प्रार्थना करते हुए परिसर में गोबर की सातियां उल्टी रखते हैं और मनोकामना पूरी होने पर उन्हें सीधा कर देते हैं। नवरात्रि के दौरान घट स्थापना से अष्टमी तक नारियल नहीं फोड़ने की परंपरा भी प्रचलित है। पुजारियों के अनुसार, अखंड ज्योत के लिए सामान्य दिनों में करीब डेढ़ क्विंटल और नवरात्रि में 10 से 25 क्विंटल तक तेल की आवश्यकता होती है।
मंदिर के प्रवेश द्वार का निर्माण भी जनसहयोग से कराया गया। जानकारी के अनुसार, स्वर्गीय कमलाबाई की इच्छानुसार उनकी ससुराल की जमीन बेचकर प्राप्त 3 लाख 61 हजार रुपये की राशि से 17 दिसंबर 2020 को मंदिर मार्ग पर भव्य प्रवेश द्वार बनवाया गया। इस कार्य में स्थानीय लोगों ने सहयोग दिया। मंदिर के पुजारी पंडित मोहन व्यास और पंडित सोनू व्यास के अनुसार, उनका परिवार पीढ़ियों से माता की पूजा-अर्चना करता आ रहा है। ग्रामवासी भी मिलकर अखंड ज्योत को प्रज्वलित रखने में सहयोग करते हैं। श्रद्धालुओं के बीच माता के जल से रोगियों के स्वस्थ होने की मान्यता भी प्रचलित है।
राजस्थान के चौमेला से दर्शन करने पहुंचे नरेश निगम ने बताया कि उनके परिवार की माता के प्रति गहरी आस्था है। उन्होंने अपने परिवार से जुड़ा एक अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके नाती के जन्म के बाद चिकित्सकों ने हृदय में छेद होने की बात कही थी। परिवार ने माता से प्रार्थना की और बाद में कराई गई जांच में बच्चा स्वस्थ पाया गया।
इस तरह बीजानगरी का श्री हरसिद्धि माता मंदिर अपने ऐतिहासिक महत्व, प्राचीन स्थापत्य कला, अनूठी परंपराओं और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था के कारण क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है।
