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मध्य प्रदेश: महंत रामकिशोर दास शास्त्री ने होली पर भाईचारे और सद्भाव का संदेश दिया
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: रंगों के पावन पर्व होली के अवसर पर भगवान के धाम में भक्ति और सद्भाव का अनूठा संगम देखने को मिला। आज मंदिर प्रांगण में आयोजित विशेष प्रवचन कार्यक्रम में श्रद्धालुओं को होली के आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व से अवगत कराया गया।
विस्तार
मध्य प्रदेश: रंगों के पावन पर्व होली के अवसर पर भगवान के धाम में भक्ति और सद्भाव का अनूठा संगम देखने को मिला। आज मंदिर प्रांगण में आयोजित विशेष प्रवचन कार्यक्रम में श्रद्धालुओं को होली के आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व से अवगत कराया गया। कार्यक्रम में महंत रामकिशोर दास शास्त्री ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि हृदयों को जोड़ने का पावन अवसर है। यह पर्व पुराने गिले-शिकवे मिटाकर आपसी बैरभाव को समाप्त करने और प्रेम, भाईचारे तथा सौहार्द की भावना को मजबूत करने का संदेश देता है। आदिकाल से चली आ रही परंपरा महंत श्री ने बताया कि होली का इतिहास आदिकाल से जुड़ा हुआ है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। उन्होंने भक्तों को समझाया कि जिस प्रकार होलिका दहन के माध्यम से अहंकार और अधर्म का अंत हुआ, उसी प्रकार मन के भीतर के द्वेष, ईर्ष्या और कटुता को भी अग्नि में समर्पित कर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि होली हमें सिखाती है कि समाज में प्रेम और एकता बनाए रखने के लिए परस्पर संवाद और क्षमा का भाव आवश्यक है। “यदि हम मन के मैल को दूर कर लें, तो जीवन में सच्चे रंग स्वतः ही खिल उठते हैं,” उन्होंने कहा।
गोवर्धन गिरिराज महाराज के मंदिर में हुआ आयोजन यह प्रवचन भगवान गोवर्धन गिरिराज जी महाराज मंदिर में आयोजित किया गया, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन और पुष्प सज्जा के बीच भक्तों ने होली पर्व के महत्व को आत्मसात किया।
गले मिलकर बढ़ाएं भाईचारा महंत रामकिशोर दास शास्त्री ने अपने प्रवचन में विशेष रूप से युवाओं को संदेश दिया कि वे सोशल मीडिया और आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच रिश्तों की गरिमा को न भूलें। होली के अवसर पर सभी से आग्रह किया गया कि वे पुरानी दुश्मनी और मतभेदों को समाप्त कर एक-दूसरे को गले लगाएं और समाज में भाईचारे की नई मिसाल कायम करें।
भक्तों ने लिया सद्भाव का संकल्प प्रवचन के उपरांत उपस्थित श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को गुलाल लगाकर प्रेम और सौहार्द का संदेश दिया। मंदिर परिसर “होली है” और “राधे-राधे” के जयघोष से गूंज उठा। निष्कर्ष होली का पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और सामाजिक समरसता का संदेश है। महंत रामकिशोर दास शास्त्री के प्रेरणादायी प्रवचन ने भक्तों को यह सीख दी कि जीवन के वास्तविक रंग प्रेम, क्षमा और भाईचारे में ही निहित हैं। समारोह सौहार्द और आनंद के वातावरण में संपन्न हुआ।
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