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राजस्थान: गुरु सेवा, स्वाध्याय और संयम से जीवन सार्थक—साध्वी प्रीतिसुधा महाराजसा

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राजस्थान  Published by: Manoj Kumar Chordiya , राजस्थान  Edited By: Kunal Tewatia, Date: 10/08/2026 10:01:51 am Share:
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  • Published by.: Manoj Kumar Chordiya ,
  • Edited By.: Kunal Tewatia,
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संक्षेप

राजस्थान: तपागच्छीय गच्छाधिपति पद्मश्री आचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंदसूरिश्वरजी महाराज साहेब की आज्ञानुवर्तिनी साध्वी प्रीतिरत्ना, साध्वी प्रीतिसुधा एवं साध्वी प्रीतियशा महाराजसा आदि ठाणा-3

विस्तार

राजस्थान: तपागच्छीय गच्छाधिपति पद्मश्री आचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंदसूरिश्वरजी महाराज साहेब की आज्ञानुवर्तिनी साध्वी प्रीतिरत्ना, साध्वी प्रीतिसुधा एवं साध्वी प्रीतियशा महाराजसा आदि ठाणा-3 के पावन सान्निध्य में रांगड़ी चौक स्थित पौषधशाला में आत्मानंद जैन सभा चातुर्मासिक समिति के तत्वावधान में आज प्रवचन के साथ बच्चों के लिए विशेष धर्म संस्कार एवं आराधना कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में बच्चों ने गुरु वंदना, जैन सूत्रों के वाचन और एकासना के माध्यम से धर्म के प्रति अपनी रुचि एवं संस्कारों का परिचय दिया। बच्चों ने फेटा वंदन, छोभ वंदन एवं द्वादशावर्त वंदन की विधि के साथ गुरु भक्ति एवं वंदना की। बच्चों ने खमासमण सूत्र, इच्छकार, इच्छाकारेण संदिसह, क्षमापना सूत्र सहित विभिन्न जैन सूत्रों का सामूहिक वाचन किया। इस दौरान बच्चों ने गुरु एवं धर्म के प्रति विनय, श्रद्धा और अनुशासन के संस्कारों को समझा। कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों में धर्म के प्रति रुचि बढ़ाने के साथ जैन संस्कारों और धार्मिक विधियों का व्यवहारिक ज्ञान देना रहा।

साध्वी प्रीतिसुधा महाराजसा ने प्रवचन में कहा कि आचार्य हरिभद्रसूरिश्वरजी के जीवन को समझने के लिए आगम ज्ञान का अध्ययन आवश्यक है। जैन धर्म में दीक्षा के तीन प्रमुख लाभ बताए गए हैं। पहला, सभी जीवों के प्रति अभयदान और अहिंसा का भाव जागृत होता है। दूसरा, निर्मल मन और क्षमाभाव का विकास होता है, जिससे सभी जीवों के प्रति मैत्री और क्षमा की भावना उत्पन्न होती है। तीसरा, गुरु सेवा का दुर्लभ अवसर प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि साधु जीवन कठिन तप और संयम का जीवन है, जिसमें भिक्षाटन और गोचरी जैसी अनेक परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। इसलिए साधु जीवन को समझे बिना उसके प्रति कोई धारणा बनाना उचित नहीं है। बच्चों को धर्म से जोड़ने का सबसे अच्छा माध्यम उन्हें छोटी उम्र से ही धार्मिक संस्कार और आराधना से जोड़ना है। केवल धर्म की बातें सुनना पर्याप्त नहीं, बल्कि उन्हें व्यवहार और दिनचर्या में उतारना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि एकासना, सूत्र वाचन, गुरु वंदना और स्वाध्याय जैसी आराधनाएं बच्चों में संयम, अनुशासन और आत्मविश्वास का भाव विकसित करती हैं।

उन्होंने अभिभावकों से भी बच्चों को धर्ममय वातावरण देने और उन्हें नियमित रूप से जैन संस्कारों से जोड़ने का आह्वान किया। कार्यक्रम में एकासना करने वाले बच्चों की धर्म आराधना की अनुमोदना करते हुए प्रभा देवी एवं सुरेंद्र बद्धाणी परिवार की ओर से सभी बच्चों का बहुमान किया गया तथा उन्हें विद्या अर्जन की सामग्री उपहार में दी गई। बच्चों ने उत्साहपूर्वक धार्मिक गतिविधियों में सहभागिता निभाई। क्रमिक आयंबिल का लाभ वर्षा देवी-प्रफुल्ल कोचर परिवार ने प्राप्त किया। कल के आयंबिल का लाभ ज्योति कोचर ने लिया। क्रमिक तेला का लाभ सुमन देवी-जिनेंद्र कोचर परिवार ने प्राप्त किया। 14 पूर्व तपस्या के लाभार्थी पारस-धीरज कोचर परिवार रहे। आज की श्रीसंघ पूजा का लाभ नीलम-प्रेमचंद कोचर परिवार ने प्राप्त किया। पद्मप्रभु ट्रस्ट के अजय बैद ने बताया कि कवीन्द्र कोचर, दिलीप कोचर, महेंद्र कोचर, ललित कोचर, अंजू कोचर, राजश्री कोचर, सुंदरलता कोचर, सोनू सिरोहिया, सरोज कोचर, सरोजना कोचर, ओहिया एवं विनीता सिरोहिया सहित बड़ी संख्या में साधर्मिक गणमान्यजनों ने भावपूर्वक प्रवचन श्रवण का लाभ लिया।