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छत्तीसगढ़: रिटायरमेंट के बाद भी जारी है समीर चंद्र प्रधान की मोबाइल मोटिवेशनल क्लास
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संक्षेप
छत्तीसगढ़: महासमुंद जिले में सेजेस पटेवा के सेवानिवृत्त प्राचार्य डॉ. समीर चंद्र प्रधान रिटायरमेंट के बाद भी शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
विस्तार
छत्तीसगढ़: महासमुंद जिले में सेजेस पटेवा के सेवानिवृत्त प्राचार्य डॉ. समीर चंद्र प्रधान रिटायरमेंट के बाद भी शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। 31 मार्च 2026 को 62 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अप्रैल से अलग अंदाज में विद्यार्थियों और शिक्षकों को प्रेरित करने का अभियान शुरू किया है। डॉ. प्रधान ने मोबाइल मोटिवेशनल क्लास की शुरुआत की है। इसके तहत वे अपनी कार से प्रत्येक सप्ताह दो से तीन विद्यालयों में पहुंचकर विद्यार्थियों और शिक्षकों को प्रेरक व्याख्यान देते हैं और संक्षिप्त वर्कशॉप भी आयोजित करते हैं। उनका उद्देश्य विशेष रूप से विद्यार्थियों को अपने व्यक्तित्व और क्षमताओं को पहचानने के लिए प्रेरित करना है। डॉ. प्रधान विद्यार्थियों को केवल करियर गाइडेंस देने के बजाय पहले अपने व्यक्तित्व को समझने और करियर का लक्ष्य निर्धारित करने पर जोर देते हैं। वे विद्यार्थियों को अपनी क्षमताओं, कमजोरियों, अवसरों और चुनौतियों की पहचान करने के लिए विभिन्न गतिविधियों और रोचक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। हाल ही में झलप के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में उन्होंने करीब 125 छात्र-छात्राओं को लगातार दो घंटे तक प्रेरक व्याख्यान दिया। विद्यालय की प्राचार्य विजय लक्ष्मी सिदार और शाला विकास समिति के अध्यक्ष निर्भय नायक ने उनके प्रयासों की सराहना की। विद्यार्थियों ने भी व्याख्यान को उपयोगी और प्रेरणादायक बताया। डॉ. प्रधान के मुताबिक, अब तक वे करीब 15 विद्यालयों में मोटिवेशनल व्याख्यान दे चुके हैं। इनमें बनपचरी, बावनकेरा, खट्टा, सुखरी डबरी, रामटुम, तुमगांव, अमलोरी, खमरिया, डीएमएस महासमुंद और छुआलीपतेरा सहित कई विद्यालय शामिल हैं। वहीं कन्या पिथौरा, गोपालपुर, सुखीपाली और देवरी के विद्यालयों से भी उन्हें आमंत्रण मिल चुका है। डॉ. समीर चंद्र प्रधान का कहना है कि “रिटायरमेंट शब्द शासन द्वारा बनाया गया है, मेरे द्वारा नहीं। मैं दूसरी पारी खेल रहा हूं।” वे दूरस्थ और साधन-विहीन विद्यालयों को अपनी मोबाइल मोटिवेशनल क्लास के लिए प्राथमिकता देते हैं। उनकी सक्रियता और अनुभव को देखते हुए अब यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि सेवानिवृत्त लेकिन पूरी तरह स्वस्थ और सक्षम शिक्षकों की सेवाओं और अनुभव का शिक्षा व्यवस्था में किस तरह बेहतर उपयोग किया जा सकता है।
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