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उत्तर प्रदेश: यूजीसी नियमों की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई मंजूर
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संक्षेप
उत्तर प्रदेश: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल में ही लागू किए गए एक नियम को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने की अनुमति दे दी. याचिका में कहा गया है
विस्तार
उत्तर प्रदेश: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल में ही लागू किए गए एक नियम को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने की अनुमति दे दी. याचिका में कहा गया है कि इस नियम में जाति- आधारित भेदभाव की परिभाषा बहुत सीमित है और कुछ वर्गों को संस्थागत सुरक्षा से बाहर रखा गया है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमलय बागची की पीठ ने यचि का दायर करने वाले वकील की तत्काल सुनवाई की मांग पर ध्यान दिया. एक वकील ने कहा कि सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव की संभावना है. मेरा मामला राहुल दीवान और अन्य बनाम संघ है. मुख्य न्यायाधीश द्वारा कहा गया कि हमें पता है कि क्या हो रहा है. सुनिश्चित करें कि खामियों को दूर किया जाए. हम इसे सूचीबद्ध करेंगे. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग( उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, वर्ष 2026 में यह अनिवार्य किया गया है कि इन समितियां में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एस टी ), विकलांग व्यक्तियों और महिलाओं के सदस्य शामिल होने चाहिए। नए विनियम यूजीसी (उच्च शिक्षण संस्थानों में बढ़ावा देना) विनियम, वर्ष 2012 का स्थान लेते हैं, जो मुख्य रूप से सलाहकारी प्रकृति के थे. यचिका में इस आधार पर विनियमन को चुनौती दी गई कि जाति- आधारित भेदभाव को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव के रूप में सख्ती से परिभाषित किया गया है। इसमें कहा गया है कि जाति आधारित भेदभाव के दायरे को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित करके, यूजीसी ने नए प्रभावी रूप से सामान्य या गैर- आरक्षित श्रेणियों से संबंधित व्यक्तियों को संस्थागत संरक्षण और शिकायत निवारण से वंचित कर दिया है, जिन्हे उन्हें जातिगत पहचान के आधार पर उत्पीड़न या पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ सकता है. इन नियमों के खिलाफ विभिन्न स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनमें छात्र समूह और संगठन इन्हें तत्काल वापस लेने की मांग कर रहे हैं।
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