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उत्तर प्रदेश: इंदिरा गांधी के चुनाव पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के 13 दिन बाद लगा था आपातकाल

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उत्तर प्रदेश  Published by: Anand Kumar , उत्तर प्रदेश  Edited By: Namita Chauhan, Date: 13/06/2026 01:03:52 pm Share:
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  • 13/06/2026 01:03:52 pm
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: 12 जून, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक बेहद महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।

विस्तार

उत्तर प्रदेश: 12 जून, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक बेहद महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। ठीक 51 वर्ष पहले 12 जून 1975 को तत्कालीन न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट मे वह ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के राजनीतिक भविष्य को संकट में डाल दिया। यही वह निर्णय था जिसने अगले 13 दिनों में देश को उसे दिशा में धकेला, जिसका अंत 25- 26 जून 1975 की मध्य रात्रि में आपातकाल की घोषणा के रूप में हुआ। 12 जून को इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला समझने के लिए 1971 में जाना होगा, जब लोकसभा चुनाव में रायबरेली सीट से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने समाजवादी नेता राज नारायण को हराया था. चुनाव में हार के बाद राज नारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी और अधिकारियों का दुरुपयोग किया। उन्होंने दावा किया कि चुनाव प्रचार में सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल किया गया और सरकारी कर्मचारी उनके चुनाव अभियान में शामिल रहे। करीब 4 साल तक चली सुनवाई के बाद 19 मार्च 1975 को अभूतपूर्व घटना हुई। इंदिरा गांधी अदालत में गवाही देने वाली भारत की पहली प्रधानमंत्री बनीं।

 

उन्होंने लगभग 5 घंटे तक न्यायालय में सवालों के जवाब दिए. इसके बाद 12 जून को इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया।  इसमें 13 दिन बाद 25 जून की रात को देश में आपातकाल लगा। 12 जून 1975 की सुबह इलाहाबाद हाई कोर्ट के कक्ष संख्या 15 में न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसला सुनाया।  238 पृष्ठ की निर्णय में अदालत ने 14 आरोपों में से 12 को खारिज कर दिया, लेकिन दो आरोपों को सही माना। पहले आरोप इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे यशपाल कपूर ने औपचारिक रूप से सरकारी पद छोड़ने से पहले ही उनके चुनाव एजेंट के रूप में काम करना शुरू कर दिया था। दूसरा आरो प उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों ने चुनावी सभाओं के लिए मंच, बिजली और अन्य व्यवस्थाएं उपलब्ध कराईं.अदालत ने माना कि यह सरकारी मशीनरी का चुनावी उपयोग था। जो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का उल्लघन था। अदालत में उनके 1971 के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया और उन्हें 6 वर्षों तक चुनाव लड़ने के लिए आयोग्य ठहरा  दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए 20 दिन का समय दिया गया।  भारत देश में पहली बार किसी मौजूदा प्रधानमंत्री का चुनाव अदालत में रद्द किया था। 13 जून 1975 को फैसले के अगले ही दिन विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया और इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की। प्रसिद्ध भारतीय साहित्यकार और लेखक रामचंद्र गुहा ने इंडिया आफ्टर मे लिखे हैं कि कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के समर्थन में व्यापक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन शुरू कर दिया।

 

14 से 19 जून 1975 मे गुहा ने बताया है कि इस दौरान इंदिरा गांधी कई बार बाहर आकर समर्थकों को संबोधित करती रहीं.लेकिन उनके विरोधियों के पास अपार संसाधन उपलब्ध थे। मामला कानून विवाद से आगे बढ़कर अस्तित्व की राजनीतिक लड़ाई बन गया। 20 जून 1975 को जब दिल्ली के बोट क्लब मैदान में इंदिरा गांधी ने एक विशाल रैली को संबोधित किया। अपने दोनों बेटों और बहू सोनिया गांधी की मौजूदगी में उन्होंने नेहरू- गांधी परिवार की सार्वजनिक सेवा की विरासत का उल्लेख किया और कहा कि वह अपनी अंतिम सांस तक देश की सेवा करती रहेंगी। 21- 22 जून 1975 को कांग्रेस के भीतर चर्चा हुई कि अगर सुप्रीम कोर्ट भी हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखना है तो आगे क्या होगा। कुछ नेताओं ने अस्थायी इस्तीफे की सलाह दी, लेकिन इंदिरा गांधी इसके लिए तैयार नहीं दिखीं। 23 जून 1975 को इंदिरा गांधी की अपील पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई।

 

24 जून 1975 को न्यायमूर्ति वी आर कृष्णा अय्यर ने इंदिरा गांधी को सीमित राहत दी। उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति मिली, लेकिन संसद के रूप में मतदान करने और वेतन लेने पर रोक लगा दी गई. 25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली को संबोधित किया। उन्होंने इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग दोहराई और 29 जून से राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने की घोषणा की। 25 जून 1975 की शाम प्रधानमंत्री के करीबी सलाहकारों ने स्थिति की समीक्षा की। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने आंतरिक आपातकाल लगाने का कानूनी मसौदा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अहमद अली को अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की सिफारिश भेजी गई। 25 जून 1975 की रात राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सिफारिश पर हस्ताक्षर कर दिए और देश में आंतरिक अशांति के आधार पर आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी।