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बिहार: क्या समर्पण की राजनीति का यही पुरस्कार है? नवादा की सियासत में उठे प्रतिनिधित्व और पारदर्शिता पर सवाल

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बिहार  Published by: Sajid Hossain , Date: 25/02/2026 04:05:13 pm Share:
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  • 25/02/2026 04:05:13 pm
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संक्षेप

बिहार: नवादा ज़िला की राजनीति में विगत वर्ष की वह परिस्थिति किसी से छिपी नहीं है, जब वक़्फ़ संशोधन विधेयक के मुद्दे पर जदयू के अल्पसंख्यक प्रखंड अध्यक्ष, महासचिव, सचिव सहित सैकड़ों पदाधिकारी और कार्यकर्ता पार्टी छोड़कर त्यागपत्र दे रहे थे।

विस्तार

बिहार: नवादा ज़िला की राजनीति में विगत वर्ष की वह परिस्थिति किसी से छिपी नहीं है, जब वक़्फ़ संशोधन विधेयक के मुद्दे पर जदयू के अल्पसंख्यक प्रखंड अध्यक्ष, महासचिव, सचिव सहित सैकड़ों पदाधिकारी और कार्यकर्ता पार्टी छोड़कर त्यागपत्र दे रहे थे। पूरे ज़िले में असमंजस और असंतोष का माहौल था। अल्पसंख्यक समाज की निगाहें टिकी थीं — कौन साथ खड़ा है और कौन किनारा कर रहा है। ऐसी कठिन परिस्थिति में हमारी टीम, एहतेशाम क़ैसर उर्फ़ बंटी के नेतृत्व में, मजबूती से पार्टी के साथ खड़ी रही। जब हर तरफ राजनीतिक अनिश्चितता थी, तब भी हमने संगठन नहीं छोड़ा। जनाजे की नमाज़ के बाद मिट्टी देने के क्रम में भी हमसे सवाल किए जाते थे — “आप लोग अभी भी पार्टी के साथ क्यों हैं?” उस समय हमने संयम, प्रतिबद्धता और संगठन के प्रति निष्ठा को प्राथमिकता दी। सिर्फ शब्दों से नहीं, कर्म से भी निष्ठा दिखाई गई। माननीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री श्री ज़मा खान साहब के कार्यक्रम में प्रखंड अध्यक्ष के रूप में एहतेशाम क़ैसर 27 गाड़ियों के काफिले और एक लाख रुपये से अधिक के व्यक्तिगत व्यय के साथ शामिल हुए। यह केवल उपस्थिति नहीं थी, बल्कि राजनीतिक प्रतिबद्धता का सार्वजनिक प्रदर्शन था।

लेकिन आज प्रश्न यह है — क्या इसी समर्पण का परिणाम यह होना चाहिए कि संगठनात्मक चुनाव की सूचना तक एक सक्रिय और समर्पित कार्यकर्ता को न दी जाए?
यदि चुनाव की प्रक्रिया इतनी पारदर्शी और निष्पक्ष थी, तो सूचना सभी तक समान रूप से क्यों नहीं पहुँची? यदि संगठन में समावेशिता है, तो 14 प्रखंडों में एक भी अल्पसंख्यक चेहरा नेतृत्व में क्यों नहीं दिखा? और सबसे बड़ा प्रश्न — चुनाव का आयोजन ऐसे स्थान पर क्यों हुआ, जहाँ राजनीतिक रूप से एक अन्य दल के प्रदेश प्रवक्ता का निवास है? क्या यह संयोग है, या संगठनात्मक मर्यादाओं की अनदेखी?
यह मुद्दा किसी एक व्यक्ति का नहीं है। यह अल्पसंख्यक राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक न्याय का प्रश्न है। जब संकट की घड़ी में साथ देने वालों को ही प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाए, तो संदेश क्या जाता है? क्या यह संकेत नहीं कि ज़मीनी निष्ठा से अधिक महत्व आंतरिक समीकरणों को दिया जा रहा है?

सामाजिक न्याय केवल मंच से दिए गए भाषणों तक सीमित नहीं रह सकता। यदि संगठनात्मक ढांचे में अल्पसंख्यकों की भागीदारी शून्य होती दिखे, तो यह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के विपरीत है। आज ज़रूरत है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा हो। ज़िला निर्वाची पर्यवेक्षक को संज्ञान लेकर स्पष्ट करना चाहिए: क्या चुनाव प्रक्रिया पूर्णतः पारदर्शी थी? क्या सभी दावेदारों को समान अवसर मिला? क्या अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व पर गंभीरता से विचार किया गया? संगठन की मजबूती आलोचना दबाने से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण संवाद से आती है। यदि समर्पित कार्यकर्ताओं को सम्मान नहीं मिलेगा, तो भविष्य में संकट की घड़ी में कौन मजबूती से खड़ा होगा?
यह लड़ाई किसी पद की नहीं, बल्कि राजनीतिक सम्मान और सामाजिक न्याय की है।