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राजस्थान: जीत के साइलेंट गेमचेंजर बने सुनील बंसल, रणनीति से टीएमसी की सत्ता हिली

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राजस्थान  Published by: Pramod Kumar Bansal , राजस्थान  Edited By: Kunal, Date: 05/05/2026 11:25:26 am Share:
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  • Published by.: Pramod Kumar Bansal ,
  • Edited By.: Kunal,
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  • 05/05/2026 11:25:26 am
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संक्षेप

राजस्थान: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों में अगर किसी एक नाम की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, तो वह हैं सुनील बंसल।

विस्तार

राजस्थान: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों में अगर किसी एक नाम की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, तो वह हैं सुनील बंसल। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राष्ट्रीय महासचिव और बंगाल के चुनावी प्रभारी बंसल की सटीक रणनीति ने तृणमूल कांग्रेस सत्ता बाहर कर दी है। उत्तर प्रदेश में भाजपा को शिखर पर ले जाने वाले बंसल बंगाल के सियासी अखाड़े में ममता बनर्जी के ‘अजेय’ किले को ढहाने के कृष्ण हैं। सुनील बंसल को अमित शाह का बेहद भरोसेमंद माना जाता है। उन्होंने वर्ष 2014 और वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत की पटकथा लिखी थी। अब वही अनुभव वे बंगाल में इस्तेमाल कर रहे थे,बंसल ने बंगाल के हर जिले में ‘बूथ मैनेजमेंट’ को इतना मजबूत किया है कि टीएमसी के कार्यकर्ता भी हैरान हैं। बंसल का पूरा ध्यान उन मतदाताओं पर रहा, जो टीवी बहसों में नहीं दिखते, लेकिन शांति से वोट के जरिए सत्ता पलट देते हैं। वे भावनाओं की बजाय डाटा और ग्राउंड फीडबैक पर काम करने के लिए जाने जाते हैं। 

टीएमसी के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि बंसल ने उन इलाकों में बीजेपी की पैठ बना दी है, जिन्हें ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता था। बंसल ने बंगाल बीजेपी के बिखरे हुए संगठन को एक सूत्र में पिरोया और अंदरूनी कलह को शांत कर केवल ‘जीत’ पर फोकस कराया। सुनील बंसल ने स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया, जिससे टीएमसी को रक्षात्मक मुद्रा में आना पड़ा। ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं के जवाब में उन्होंने केंद्र की योजनाओं के लाभार्थियों का एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया। सुनील बंसल की खासियत यह है कि वे मीडिया की सुर्खियों से दूर रहकर पर्दे के पीछे काम करते हैं। टीएमसी के रणनीतिकार अब तक उनकी काट नहीं ढूंढ पाये। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 4 मई के नतीजे  चौंकाने वाले रहे है तो उसका पूरा श्रेय बंसल की इसी ‘साइलेंट’ रणनीति को जायेगा। नबान्न की लड़ाई में इस बार चेहरा भले ही स्थानीय नेताओं का हो, लेकिन दिमाग और दांव-पेंच सुनील बंसल के हैं।  यूपी का चाणक्य बंगाल में भी कमल खिला पाया , इसका फैसला 4 मई को आज हों चूका।