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उत्तर प्रदेश: उच्च शिक्षा विस्तार के बीच उर्दू की अनदेखी पर हुआ विवाद

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उत्त  Published by: Sajid Hossain , उत्त  Edited By: Namita Chauhan, Date: 08/05/2026 03:51:56 pm Share:
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  • Published by.: Sajid Hossain ,
  • Edited By.: Namita Chauhan,
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  • 08/05/2026 03:51:56 pm
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: बिहार सरकार ने उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है। 208 नए डिग्री महाविद्यालयों की स्थापना का निर्णय स्वागतयोग्य है।

विस्तार

उत्तर प्रदेश: बिहार सरकार ने उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है। 208 नए डिग्री महाविद्यालयों की स्थापना का निर्णय स्वागतयोग्य है। लेकिन उच्च शिक्षा विभाग की अधिसूचना संख्या 634, दिनांक 30.04.2026 ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। इन 208 कॉलेजों में एक भी उर्दू का पद नहीं है। उर्दू 1980 से बिहार की द्वितीय राजकीय भाषा है। बिहार राजभाषा अधिनियम की धारा-3 कहती है कि सरकारी कामकाज, शिलापट्ट, योजनाओं के बोर्ड उर्दू में भी होंगे। जब भाषा को 'राजकीय' दर्जा प्राप्त है, तो उसके शिक्षण की व्यवस्था खत्म करना सीधे-सीधे कानून की भावना के खिलाफ है।हर साल बिहार विद्यालय परीक्षा समिति से 1.2 लाख से अधिक छात्र 12वीं में उर्दू विषय लेकर उत्तीर्ण होते हैं। B.A., M.A. में उर्दू पढ़ने वाले हजारों छात्र हैं। 500 से अधिक NET/JRF योग्य उर्दू अभ्यर्थी नौकरी की प्रतीक्षा में हैं। नए कॉलेजों में उर्दू नहीं होगी तो ये छात्र कहां जाएंगे? क्या 'उच्च शिक्षा का विस्तार' का मतलब 'उर्दू का संकोच' है?

सांस्कृतिक नुकसान  

उर्दू सिर्फ एक भाषा नहीं, बिहार की गंगा-जमुनी तहजीब की पहचान है। कबीर, जायसी, नज़ीर अकबराबादी से लेकर फणीश्वर नाथ रेणु तक सबने उर्दू-हिंदी के संगम से साहित्य रचा। आज जब नई शिक्षा नीति 2020 भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने की बात करती है, तब बिहार में उर्दू को पाठ्यक्रम से बाहर करना विरोधाभास है।

'न्याय के साथ विकास' की कसौटी  

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार 'न्याय के साथ विकास' और 'सात निश्चय-2' के तहत शिक्षा पर विशेष जोर दे रही है। महिला सशक्तिकरण हो या अल्पसंख्यक कल्याण उर्दू दोनों से जुड़ी है। क्योंकि उर्दू पढ़ने वालों में बड़ी संख्या में ग्रामीण पृष्ठभूमि की छात्राएं हैं। उर्दू को हटाना 'समावेशी विकास' के दावे को कमजोर करता है। सरकार की मंशा पर सवाल नहीं, लेकिन नौकरशाही की चूक स्पष्ट है। 208 नए कॉलेज बन रहे हैं तो हर कॉलेज में कम से कम 2 उर्दू सहायक प्राध्यापक के पद सृजित हों। अधिसूचना 634 में तत्काल संशोधन कर अनुपूरक सूची जारी की जाए। बिहार ने हमेशा भाषाई सद्भाव की मिसाल पेश की है। हिंदी-उर्दू यहां सौतन नहीं, सहेली हैं। एक को बढ़ाने के लिए दूसरी को मिटाना जरूरी नहीं।  उम्मीद है कि 'सम्राट कैबिनेट' की पहली बैठक में ही इस भूल को सुधारा जाएगा। क्योंकि उर्दू का सवाल सिर्फ एक भाषा का नहीं, बिहार के लाखों छात्रों के भविष्य, रोजगार और सांस्कृतिक अस्मिता का है।