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उत्तर प्रदेश: IITR शोध में बड़ा खुलासा प्लास्टिक का BPA बच्चों के दिमाग और याददाश्त पर डाल रहा असर

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उत्तर प्रदेश  Published by: Anand Kumar (UP) , उत्तर प्रदेश  Edited By: Kunal Tewatia, Date: 21/07/2026 10:11:49 am Share:
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  • Published by.: Anand Kumar (UP) ,
  • Edited By.: Kunal Tewatia,
  • Date:
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: बच्चों के टिफिन बॉक्स, पानी की प्लास्टिक बोतल और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक, बच्चों की सीखने और याद रखने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है.

विस्तार

उत्तर प्रदेश: बच्चों के टिफिन बॉक्स, पानी की प्लास्टिक बोतल और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक, बच्चों की सीखने और याद रखने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है. भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (आईआईटीआर) के वैज्ञानिकों के शोध में खुलासा हुआ है कि प्लास्टिक में पाया जाने वाला बिस्फेनॉल-ए (बीपीए) नामक रसायन विज्ञान की कोशिकाओं तक ऊर्जा पहुंचने की प्रक्रिया बाधित करता है. इससे नई तंत्रिका कोशिकाओं का विकास धीमा पड़ जाता है और याददाश्त व सीखने की क्षमता कमजोर होने लगती है. जर्नल ऑफ बायोकेमिस्ट्री में प्रकाशित यह शोध करीब 5 वर्ष तक चला. शोध का नेतृत्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रजनीश कुमार चतुर्वेदी ने किया.शोध  टीम में फूलमाला चौहान, सौरभ तिवारी, रंजीत कुमार यादव और श्वेता सिंह शामिल रहे. शोध में निकले निष्कर्ष को यूरोपियन यूनियन की बीपीए रेगुलेटरी गाइडलाइंस मैं भी शामिल किया गया है. डॉ. रजनीश के अनुसार,बीपीए प्लास्टिक की पानी बोतलों टिफिन, बॉक्स फूड पैकेजिंग और अन्य खाद्य कंटेनरों में व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है. सामान्य परिस्थितियों में

 इसकी बहुत कम मात्रा भी प्लास्टिक से भोजन में पहुंच सकती है. यह जोखिम तब और बढ़ जाता है, जब प्लास्टिक के बर्तनों में गरम खाना, गर्म दूध, चाय या नींबू जैसे खट्टे खाद्य पदार्थ रखे जाते हैं. शोध में मस्तिष्क के हिप्पोकैं पस वाले हिस्से पर खास ध्यान दिया गया, जो सीखने और याददाश्त का प्रमुख केंद्र माना जाता है. वैज्ञानिकों ने पाया कि बीपीए तांत्रिका कोशिकाओं के भीतर मौजूद शरीर के पावर हाउस माइटोकाँन्ड्रिया की कार्य प्रणाली को प्रभावित करता है. एडवांस इमेजिंग तकनीक से यह भी पता चला कि बीपीए के संपर्क में आने पर मस्तिष्क में माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या काम हो गई और तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संपर्क कमजोर पड़ गए. शोधकर्ताओं ने कोशिकाओं और प्रयोगशाला के जानवरों पर प्रयोग किया. उन्हें बीपीए की उतनी ही मात्रा दी गई, जितनी सामान्य व्यक्ति को रोजमर्रा भोजन के जरिए मिल सकती है. करीब 3 महीने बाद जानवरों में सीखने और याद रखने की क्षमता घटती हुई पाई गई. नई तंत्रिका कोशिकाओं का निर्माण घटा मिला. साथ ही ऊर्जा पहुंचाने वाले काइनेसिन प्रोटीन की गतिविधियां भी प्रभावित पाई गई, जिससे कोशिकाओं के भीतर ऊर्जा का प्रवाह धीमा हो गया था। 


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