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उत्तर प्रदेश: संतकबीरनगर में दो दिवसीय संस्कृति महोत्सव का समापन, शिक्षकों ने लोककला को कलाकृतियों में उतारा
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संक्षेप
उत्तर प्रदेश: संतकबीरनगर में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, उत्तर प्रदेश तथा जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) के संयुक्त तत्वावधान में बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षकों के लिए आयोजित दो दिवसीय ‘हमारी परंपरा एवं संस्कृति संबंधी कला प्रदर्शनी एवं संस्कृति महोत्सव’ का शुक्रवार को समापन हुआ।
विस्तार
उत्तर प्रदेश: संतकबीरनगर में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, उत्तर प्रदेश तथा जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) के संयुक्त तत्वावधान में बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षकों के लिए आयोजित दो दिवसीय ‘हमारी परंपरा एवं संस्कृति संबंधी कला प्रदर्शनी एवं संस्कृति महोत्सव’ का शुक्रवार को समापन हुआ। आयोजन के दौरान शिक्षकों ने भारतीय लोककला, लोक परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और विभिन्न कला विधाओं को अपनी रचनात्मक कलाकृतियों के माध्यम से प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति के विविध रंगों और स्थानीय परंपराओं की झलक देखने को मिली। कार्यक्रम का शुभारंभ उप शिक्षा निदेशक एवं डायट प्राचार्य डॉ. नरेंद्र सिंह तथा विशिष्ट अतिथि समाजसेवी प्रदीप सिसोदिया ने मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलित कर किया। इसके बाद अतिथियों ने कला प्रदर्शनी का अवलोकन किया और शिक्षकों द्वारा तैयार की गई विभिन्न कलाकृतियों की जानकारी ली। उन्होंने शिक्षकों की रचनात्मकता और सांस्कृतिक विषयों को कला के माध्यम से प्रस्तुत करने के प्रयासों की सराहना की। प्राचार्य डॉ. नरेंद्र सिंह ने कहा कि भारतीय परंपराएं और संस्कृति देश की पहचान हैं। अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहना समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि विद्यालय बच्चों को केवल किताबी ज्ञान देने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि उनके व्यक्तित्व निर्माण और सांस्कृतिक मूल्यों के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि विद्यालयों के माध्यम से विद्यार्थियों में अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रति गौरव और संवेदनशीलता विकसित की जानी चाहिए। साथ ही नई पीढ़ी को लोक परंपराओं और कला विधाओं के संरक्षण के प्रति जागरूक करना भी जरूरी है। विशिष्ट अतिथि प्रदीप सिसोदिया ने कहा कि कला और संस्कृति शिक्षा को जीवन एवं समाज से जोड़ने का प्रभावी माध्यम हैं। इस तरह के आयोजनों से शिक्षकों और विद्यार्थियों में रचनात्मक सोच विकसित होती है। साथ ही स्थानीय कला, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान की भावना भी मजबूत होती है। महोत्सव के दौरान शिक्षकों ने अलग-अलग लोककलाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को कलाकृतियों के माध्यम से प्रदर्शित किया। उनकी प्रस्तुतियों में भारतीय संस्कृति की विविधता और स्थानीय विरासत की झलक दिखाई दी। दो दिवसीय आयोजन ने शिक्षकों को अपनी रचनात्मक प्रतिभा प्रदर्शित करने के साथ-साथ सांस्कृतिक विषयों पर विचार साझा करने का अवसर भी प्रदान किया। इस अवसर पर राज्य पुरस्कार प्राप्त शिक्षक डॉ. अभिषेक कुमार सिंह, प्रवक्ता हीरा लाल इंटर कॉलेज ने भी प्रदर्शनी में प्रस्तुत उत्कृष्ट कलाकृतियों का अवलोकन किया। उन्होंने शिक्षकों की ओर से किए गए रचनात्मक प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार की गतिविधियां शिक्षा व्यवस्था में रचनात्मकता और सांस्कृतिक चेतना को बढ़ावा देती हैं। कार्यक्रम की संयोजिका सुश्री तृप्ति श्रीवास्तव, प्रवक्ता ने आयोजन की रूपरेखा तैयार करने के साथ विभिन्न गतिविधियों का समन्वय किया। उनके निर्देशन में दो दिवसीय कार्यक्रम में शिक्षकों की सहभागिता सुनिश्चित की गई। महोत्सव के समापन अवसर पर आयोजकों ने कहा कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। कला प्रदर्शनी जैसे आयोजन विद्यार्थियों को अपनी जड़ों और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में सहायक साबित होते हैं। कार्यक्रम में शिक्षकों की प्रस्तुतियों और सहभागिता ने भारतीय परंपरा एवं संस्कृति के विविध रूपों को प्रभावी ढंग से सामने रखा।
