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मध्य प्रदेश: 2017 के बाद फिर चर्चा में EVM का मुद्दा, मायावती ने उठाई थी बैलेट पेपर से चुनाव की मांग
- Photo by : social media
संक्षेप
मध्य प्रदेश: लखनऊ भारतीय राजनीति में चुनाव परिणाम आते ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर सवाल उठना आम बात बन गई है हालांकि ईवीएम के मुद्दे पर विपक्षी दलों के रुख की समीक्षा की जाए तो उनकी नीयत और दोहरे मापदंड पूरी तरह उजागर होते हैं।
विस्तार
मध्य प्रदेश: लखनऊ भारतीय राजनीति में चुनाव परिणाम आते ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर सवाल उठना आम बात बन गई है हालांकि ईवीएम के मुद्दे पर विपक्षी दलों के रुख की समीक्षा की जाए तो उनकी नीयत और दोहरे मापदंड पूरी तरह उजागर होते हैं। वर्ष 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणामों के तुरंत बाद सुश्री बहन कुमारी मायावती जी ने लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ईवीएम की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए थे उन्होंने देश के लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग से तत्काल बैलट पेपर के जरिए चुनाव कराने की स्पष्ट मांग की थी। विरोधी दलों की संदिग्ध चुप्पी जब इस बुनियादी लोकतांत्रिक मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया तब खुद को लोकतंत्र का हितैषी बताने वाले अन्य विरोधी दलों ने इस मुहिम को अपना समर्थन नहीं दिया जो दल लगातार अनर्गल बयानबाजी कर जनता के बीच भ्रम फैलाने का कार्य करते हैं उन्होंने उस समय बैलट पेपर की मांग से दूरी बनाए रखी। क्या अंदरखाने ईवीएम व्यवस्था के पक्ष में है विपक्ष 2017 में उठे इस आह्वान पर अन्य दलों का मौन रवैया यह संकेत देता है कि वे अंदरखाने ईवीएम व्यवस्था से सहज थे। वर्तमान में जब भी इन दलों को चुनावों में हार का सामना करना पड़ता है। तब वे केवल अपनी राजनीतिक विफलता को छिपाने के लिए ईवीएम का विरोध करने का नाटक करते हैं। उनका यह आचरण साबित करता है कि उनका विरोध महज एक सामूहिक दिखावा है। जनता से सतर्क रहने की अपील यदि ये विरोधी दल वास्तव में पारदर्शी चुनाव व्यवस्था के प्रति गंभीर होते तो उसी समय इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाते परंतु ऐसा न करके उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि उनका विरोध केवल चुनावी मौसम तक सीमित रहता है। जनता को ऐसे दोहरे चरित्र और गुमराह करने वाली राजनीति से सतर्क रहने की आवश्यकता है।
