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मध्य प्रदेश: मध्यप्रदेश के थांदला में भगोरिया की मस्ती में डूबा आदिवासी अंचल
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: इस वर्ष जिले में थांदला नगर का प्रथम भगोरिया होने से एवं पलायन होने की दशा में आंशिक रूप से भीड़ कम रही भगोरिया में राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के स्वरूप भाजपा की गैर में पूर्व विधायक कलसिंह भाबर
विस्तार
मध्य प्रदेश: इस वर्ष जिले में थांदला नगर का प्रथम भगोरिया होने से एवं पलायन होने की दशा में आंशिक रूप से भीड़ कम रही भगोरिया में राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के स्वरूप भाजपा की गैर में पूर्व विधायक कलसिंह भाबर,भाजपा नेता एवं पूर्व जियोसे सदस्य विश्वास सोनी, नगर परिषद अध्यक्ष प्रतिनिधि सुनील पणदा, मंडल अध्यक्ष बंटी डामोर, पूर्व मंडल अध्यक्ष रोहित बैरागी, मंडल महामंत्री जितेंद्र राठौड़ सहित सैकड़ों पदाधिकारी, कार्यकर्ता मौजूद थे वहीं कांग्रेस की गैर का प्रतिनिधित्व विधायक वीरसिंह भूरिया, जसवंत भाबर,गेंदाल डामोर, चेनसिंह डामोर, राजेश डामोर, जितेंद्र धामन, युवा नेता अक्षय भट्ट, विधायक प्रतिनिधि वीरेंद्र बारिया, शहर कांग्रेस अध्यक्ष आनंद चौहान, पार्षद सुधीर भाबर, अकिल जैन सम्मिलित थे जयस पार्टी ने भी जोश खरोंच के साथ नगर में गैर निकाली छुट्टा मजदूर संघ ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। गुलाल उड़ती और उल्लास भरा वातावरण छा जाता। रियासत काल में राजा व जागीरदार भी इसमें शामिल होते थे। वे होली की गोट यानी पुरस्कार स्वरूप कुछ नगदी व वस्तु अपनी प्रजा के बीच बांटते थे। अब यह भूमिका जन प्रतिनिधियों के हिस्से में आ गई है। इस वर्ष भगोरिया मेले में नगर परिषद थांदला द्वारा संपूर्ण नगर के चौराहे पर टेंट एवं मीठा शरबत की व्यवस्था मुख्य नगर पालिका अधिकारी कमलेश जायसवाल, इंजिनियर पप्पु बारिया, पारसिंह, अंशुल परिहार स्वास्थ अधिकारी गौरांक सिंह राठौर, सहायक लेखापाल यशदीप अरोरा सहित परिषद के कर्मचारीयो ने मेले की व्यवस्था संभाली वही सुरक्षा के हिसाब से एसडीओपी, थाना प्रभारी अशोक कनेश अपने दल बल के साथ नगर में भ्रमण कर शांति पूर्वक भगोरिया को सम्पन्न करवाने में अपनी अहम भूमिका दर्ज करवाई।
भगोरिया मेला मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मेला आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करता है। आदिवासी अंचल में भगोरिया मेले का ऐतिहासिक महत्व है। हजारों की संख्या में लोग मांदल की थाप और बांसुरी की धुन पर पारंपरिक नृत्य करते हुए निकले। युवतियां भी पारंपरिक गेर भगोरिया का सबसे बड़ा आकर्षण रही। भगोरिया को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। पूर्व विधायक कलसिंह भाबर ने बताया कि भगोर नामक गांव माताजी के श्राप से उजड़ गया था जो बाद में वापस बसा। इस खुशी में वहां वार्षिक मेला आयोजित किया गया।
बाद में इस तरह के मेले अन्य कस्बों में भी लगने लगे, चूंकि यह परंपरा भगोर की तर्ज पर शुरू हुई थी, इसलिए इसका नाम भगोरिया पड़ गया। एक अन्य प्रथा के अनुसार होली के सात दिन पहले आने वाले हाट प्राचीनकाल में गुलालिया हाट कहे जाते थे।
अब भगोरिया हाट के नाम से विख्यात होने लगे सभी ग्रामीण हाट बाजार स्थल पर ही एकत्रित हो जाते।