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उत्तर प्रदेश: उखाड़ी जा रहीं 56 लाख की डिजाइनर लाइटें, विभागीय समन्वय पर उठे सवाल
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संक्षेप
उत्तर प्रदेश: शहर में विकास कार्यों की जल्दबाजी और विभागीय समन्वय की कमी एक बार फिर सवालों के घेरे में है।
विस्तार
उत्तर प्रदेश: शहर में विकास कार्यों की जल्दबाजी और विभागीय समन्वय की कमी एक बार फिर सवालों के घेरे में है। पिछले वर्ष करीब 56 लाख रुपये की लागत से लगाई गई, डिजाइनर लाइटों को अब सड़क चौड़ीकरण के लिए हटाया जा रहा है। महज एक साल पहले स्थापित की गई इन लाइटों को उखाड़े जाने से स्थानीय लोगों में नाराजगी है और सरकारी धन के दुरुपयोग को लेकर चर्चा तेज हो गई है। दरअसल, नाथ कॉरिडोर परियोजना के तहत शहर के सात प्रमुख शिव मंदिरों को जोड़ते हुए धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई थी। लगभग 200 करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के अंतर्गत कुदेशिया पुल से जीआरएम स्कूल मार्ग समेत कई प्रमुख सड़कों पर भगवान शिव के प्रतीक त्रिशूल, डमरू और ॐ की आकृतियों वाले आकर्षक पोल लगाए गए थे। इन खंभों पर वर्ष 2025 में कुल 80 विशेष लाइटें लगाई गई थीं। प्रत्येक लाइट पर लगभग 70 हजार रुपये खर्च हुए थे। अब सीएम ग्रिड योजना के तहत सड़क चौड़ीकरण का कार्य शुरू होने के बाद इन्हीं पोलों और लाइटों को हटाया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सड़क चौड़ीकरण की योजना पहले से प्रस्तावित थी तो करोड़ों रुपये की परियोजना के बीच लाखों रुपये खर्च कर इन डिजाइनर लाइटों और टाइल्स को लगाने का क्या औचित्य था। लोगों ने इसे योजनाओं में दूरदर्शिता की कमी और विभागों के बीच तालमेल न होने का उदाहरण बताया है। नैनीताल रोड पर लगे त्रिशूल डिजाइन वाले पोलों को हटाने का काम शुरू होने के बाद लोगों ने सोशल मीडिया पर भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। उनका कहना है कि पहले निर्माण और फिर कुछ ही समय बाद तोड़फोड़ की प्रक्रिया से सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। पीडब्ल्यूडी और नगर निगम के अलग-अलग बयान पीडब्ल्यूडी की विद्युत इकाई के अधिशासी अभियंता अनिल कुमार ने कहा कि विभाग ने कार्य पूरा कर सड़क नगर निगम को हैंडओवर कर दी थी। उन्हें लाइटों के खंभे हटाए जाने की जानकारी नहीं है। वहीं नगर निगम के मुख्य अभियंता मनीष अवस्थी का कहना है कि सीएम ग्रिड योजना के तहत सड़क चौड़ीकरण किया जा रहा है, जिसकी वजह से इन लाइटों को हटाना पड़ रहा है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि दोनों परियोजनाएं पहले से प्रस्तावित थीं तो विभागों के बीच समन्वय क्यों नहीं बनाया गया। जनता का कहना है कि योजनाओं में बेहतर प्लानिंग होती तो लाखों रुपये की लागत से लगाए गए पोल और लाइटें एक साल में ही हटाने की नौबत नहीं आती।
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