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उत्तर प्रदेश: मानसिक स्वास्थ्य सुधार में पौधों की ताकत पर कार्यशाला, छात्राओं ने सीखे प्राकृतिक उपचार के गुण 

उत्तर प्रदेश: दिनांक 08/5/26 को रघुनाथ गर्ल्स पीजी कॉलेज की प्राचार्या प्रोफेसर निवेदिता कुमारी जी के निर्देशन में प्लांट कंजर्वेश

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उत्तर प्रदेश  Published by: Mohd Anas , उत्तर प्रदेश  Edited By: Kunal, Date: 09/05/2026 11:05:28 am Share:
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  • Edited By.: Kunal,
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  • 09/05/2026 11:05:28 am
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: दिनांक 08/5/26 को रघुनाथ गर्ल्स पीजी कॉलेज की प्राचार्या प्रोफेसर निवेदिता कुमारी जी के निर्देशन में प्लांट कंजर्वेशन सोसायटी के द्वारा एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।

विस्तार

उत्तर प्रदेश: दिनांक 08/5/26 को रघुनाथ गर्ल्स पीजी कॉलेज की प्राचार्या प्रोफेसर निवेदिता कुमारी जी के निर्देशन में प्लांट कंजर्वेशन सोसायटी के द्वारा एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का विषय मानसिक स्वास्थ्य के लिए पौधों की चिकित्सीय क्षमता तथा रिसोर्स पर्सन, डॉ सुजाता, असिस्टेंट प्रोफेसर, मुलतानीमल कॉलेज, मोदीनगर रही। डॉ सुजाता ने अपने व्याख्यान में ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और तनाव को कम करने में पेड़-पौधे प्राकृतिक चिकित्सा का काम करते हैं। पौधों की देखभाल करने और उनके बीच समय बिताने से तनाव, चिंता और अवसाद के लक्षणों में कमी आती है। यह प्रक्रिया दिमाग को शांत करती है और एकाग्रता में सुधार करती है। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रमुख चिकित्सीय पौधें जैसे लैवेंडर, तुलसी, एलोवेरा, रोज़मेरी, लेमन ग्रास आदि के प्रयोग के बारे में जानकारी दी । उन्होंने कहा कि पौधों का हरा रंग और प्राकृतिक सुगंध दिमाग को शांति प्रदान करती है। पौधों की देखभाल, जैसे पानी देना और कटाई-छंटाई करना, एक ध्यान जैसा अनुभव देता है, जो अकेलेपन को कम करता है।

कार्यक्रम की संयोजिका तथा आयोजन सचिव डॉ गरिमा मलिक ने बताया कि मनुष्य पौधों को अपने जीवन का हिस्सा बनाकर प्राकृतिक तरीके से अपनी मानसिक सेहत को सुधार सकते हैं। व्याख्यान के बाद छात्राओं ने हर्बल गार्डन का भ्रमण किया और औषधीय पौधों को लगाने और देखभाल की विधि के बारे में जानकारी ली। इसके साथ ही प्रतिभागियों ने कई पौधों की कटिंग के द्वारा नई पौध तैयार की । कार्यशाला के दौरान डॉ गरिमा मलिक ने बताया कि औषधीय पौधों को तेज़ी से और स्वस्थ रूप से बढ़ाने के लिए अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी (मिट्टी, गोबर की खाद, और रेत का मिश्रण), भरपूर धूप (6-8 घंटे), और नियमित जैविक खाद (जैसे नीमखली) का उपयोग करें। गिलोय, तुलसी, और एलोवेरा जैसे पौधों के लिए सही समय पर (सुबह या देर दोपहर) पानी देना और हर 15-20 दिनों में हल्की छंटाई करना ज़रूरी है। छात्राओं के लिए यह कार्यशाला अति लाभकारी रही । कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ मधु मलिक तथा डॉ अनुपमा सिंह का विशेष योगदान रहा।