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बिहार: पुणे जसीडीह एक्सप्रेस में एक टीटीई की सच्ची दास्तान

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बिहार  Published by: Avay Kumar Ranjan , Date: 13/02/2026 10:53:30 am Share:
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  • 13/02/2026 10:53:30 am
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संक्षेप

बिहार: आज मैंने रेलवे के कर्मचारी में एक टीटीई की कुशल नेतृत्व करते जो देखा, मैं अपनी कलम को विराम देना उचित नहीं समझा, और मैं एक रेलवे कर्मचारी की सच्ची दास्तां बयां करने की जुर्रत कर डाला।शनिवार को सुबह के बाद दोपहर का समय था, मै इस बार घ

विस्तार

बिहार: आज मैंने रेलवे के कर्मचारी में एक टीटीई की कुशल नेतृत्व करते जो देखा, मैं अपनी कलम को विराम देना उचित नहीं समझा, और मैं एक रेलवे कर्मचारी की सच्ची दास्तां बयां करने की जुर्रत कर डाला।शनिवार को सुबह के बाद दोपहर का समय था, मै इस बार घर से तैयार होकर अपनी पत्रकारिता हेतु नहीं बल्कि बाबा भोलेनाथ की नगरी देवघर जाने घर से निकला था। गया की ओर से आ रही थी,पुणे जसीडीह एक्सप्रेस 11427 अपने तय समय से थोड़ी लेट पर तेज़ रफ्तार से दौड़ी आ रही थी। मैं ट्रेन के B/1 कोच में अपनी आरक्षित सीट में नवादा से सवार हो गया , और खिड़की से दिखते खेत,गांव और दूर क्षितिज पर सूरज का तेज उजाला सफर को और भी यादगार बना रहा था। मैं इस बार किसी पत्रकारिता की उद्देश्य से यात्रा पर नहीं, बल्कि  जसीडीह से उतरकर देवघर में भोले बाबा  का दर्शन करने निकला था। काम से एक छोटी-सी छुट्टी मिली थी,और उसी का लाभ उठाकर यात्रा पर निकला था। जब मैंने अपनी बर्थ पर बैठकर बैग रखा ही था, तभी एक टीटीई हाथ में एचएचटी टैबलेट लिए कोच में आए और विनम्रता से बोले, 'टिकट प्लीज़।' उनका अंदाज़ सधा हुआ था, चेहरा शांत लेकिन सजग और बातचीत में आत्मीयता थी। 

काले कोट, सफेद शर्ट, कंधे पर बैग और हाथ में एचएचटी लिए वे एक सजीव अनुशासन की मिसाल लग रहे थे। मैंने टिकट दिखाया और बातों-बातों में जाना कि उनका नाम बीरेंद्र कुमार है। वे डीडीयू मंडल के अंतर्गत कार्यरत एक अनुभवी टीटीई हैं, जो इस समय डीडीयू टीटी लॉबी में स्लीपर लिंक में तैनात हैं।यूं तो हर सफर में टीटीई से आमना-सामना होता है, लेकिन इस बार बातों का सिलसिला कुछ अलग ही था। ट्रेन की हलचल के बीच बीरेंद्र कुमार मुस्कराते हुए यात्रियों से बातचीत करते, टिकट जांचते, किसी की परेशानी सुनते, किसी को खाली सीट के लिए मदद करते नज़र आ रहे थे। ये वही लोग हैं जिन्हें हम अक्सर नज़र अंदाज़ कर देते हैं, लेकिन असल में ये रेलवे के फ्रंटलाइन स्टाफ और रेल के असली राजदूत होते हैं आम जनता के सबसे करीब, हर समय सामने, हमेशा सक्रिय।रेलवे में अधिकतर लोग कुर्सी वाली नौकरियों को पसंद करते हैं आराम, फाइलें, एसी दफ्तर।लेकिन टीटीई की कोई कुर्सी नहीं होती। उनका दफ्तर वो चलती ट्रेन है,जहां हर स्टेशन पर हालात बदल जाते हैं, हर डिब्बे में नई चुनौतियाँ होती हैं।गर्मी हो या ठंड, भीड़ हो या कोई आपात स्थिति टीटीई हर हाल में अपनी ड्यूटी निभाते हैं। 

टिकट जांचते हुए उनका सामना सिर्फ कागजों से नहीं, सैकड़ों चेहरों और उनकी कहानियों से होता है।बातों के बीच बीरेंद्र कुमार ने एक घटना सुनाई जिसने मुझे झकझोर दिया। एक बार एक यात्री बिना टिकट सफर कर रहा था और जब नियम के अनुसार जुर्माना लगाया गया, तो उसने रेलवे की 139 हेल्पलाइन पर झूठी शिकायत कर दी। टीटीई ने दुर्व्यवहार किया। लेकिन जब अन्य यात्रियों से पूछताछ और जांच हुई तो सच सामने आया। इसके बावजूद बीरेंद्र कुमार ने उस व्यक्ति से कोई कठोर व्यवहार नहीं किया,बल्कि नियमों के अंतर्गत मामले को संयम से सुलझाया।उन्होंने कहा, 'जब लोगों के पास टिकट नहीं होता है तो कुछ लोग झूठी शिकायतें भी कर देते हैं, लेकिन हम संयम से काम लेते हैं, क्योंकि हम डांटने नहीं, समझाने आए हैं।'टीटीई का काम सिर्फ टिकट जांचना नहीं होता। वे हर यात्री की पहली ज़रूरत होते हैं। कोई महिला अकेली हो, कोई बुजुर्ग सहारा चाहता हो, कोई बीमार यात्री रास्ते में फंस जाए तो सबसे पहले लोग टीटीई को ही आवाज़ देते हैं। सीट न मिले तो शिकायत, सीट मिल जाए तो धन्यवाद। इन दोनों के बीच जो मुस्कान बंटती है, वो शायद ही किसी दफ्तर में बैठे कर्मचारी को नसीब होती हो।कोरोना काल की जब बात आई थी,तो बीरेंद्र कुमार का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया था।उस वक़्त डर तो सबको था, लेकिन ड्यूटी का बुलावा ज्यादा बड़ा था। किट पहनकर दिनभर ट्रेन में घूमना, यात्रियों की मदद करना, टिकट की जांच के साथ-साथ थर्मल स्कैनर से उनका तापमान जांचना ये सब हमारी ज़िम्मेदारी थी। कोई घर जाने से डरता था, लेकिन रेलवे ने हमें आगे रखा और हम पीछे नहीं हटे। यह थे रेलवे के फ्रंट लाइन कहे जाने वाले चेकिंग स्टाफ ( टीटीई ) बीरेंद्र कुमार, उपमुख्य टिकट निरीक्षक, डीडीयू इसी रेलवे की दास्तान।