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मध्य प्रदेश: भ्रष्टाचार और जवाबदेही पर कमल पाटनी का सवाल— ‘सरकारी अफसरों का पेट या अंधा कुआँ?’
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: भारत की नौकरशाही का उद्देश्य जनता की सेवा, सुशासन और संविधान के अनुरूप प्रशासन चलाना है। लेकिन समय-समय पर सामने आने वाले भ्रष्टाचार के मामले यह प्रश्न खड़ा करते हैं कि कहीं सरकारी पद जनसेवा से अधिक निजी लाभ का माध्यम तो नहीं बनते जा रहे हैं।
विस्तार
मध्य प्रदेश: भारत की नौकरशाही का उद्देश्य जनता की सेवा, सुशासन और संविधान के अनुरूप प्रशासन चलाना है। लेकिन समय-समय पर सामने आने वाले भ्रष्टाचार के मामले यह प्रश्न खड़ा करते हैं कि कहीं सरकारी पद जनसेवा से अधिक निजी लाभ का माध्यम तो नहीं बनते जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग, भर्ती परीक्षाओं, सरकारी खरीद, टेंडरों, भूमि, निर्माण कार्यों और पोस्टिंग से जुड़े अनेक मामलों में कथित अनियमितताओं के आरोप सामने आते रहे हैं। कई मामलों में जांच एजेंसियां कार्रवाई करती हैं, गिरफ्तारियां होती हैं और अवैध संपत्तियां जब्त भी की जाती हैं। फिर भी आम नागरिक के मन में यह प्रश्न बना रहता है कि जो मामले सामने ही नहीं आते, उनका क्या? समस्या केवल बड़े शहरों या बड़े अधिकारियों तक सीमित नहीं है। स्थानीय निकायों तक भी भ्रष्टाचार, भेदभाव और मनमानी के आरोप पहुंचते रहे हैं। रतलाम नगर निगम की कार्यप्रणाली पर भी वर्षों से नागरिक गंभीर प्रश्न उठाते रहे हैं। आरोप लगाए जाते रहे हैं कि कई मामलों में नियमों का समान रूप से पालन नहीं होता। कहीं कार्रवाई होती है तो कहीं प्रभावशाली लोगों के मामलों में प्रशासन मौन दिखाई देता है। भवन अनुमति, अतिक्रमण, नामांतरण, कर निर्धारण और अन्य प्रशासनिक मामलों में पारदर्शिता तथा निष्पक्षता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। रतलाम की तत्कालीन रियासतकालीन निजी भूमि से जुड़े विवाद भी इसी चिंता को उजागर करते हैं। वर्षों से यह आरोप लगाए जाते रहे हैं कि 1948 की अधिसूचना और उपलब्ध राजस्व अभिलेखों के बावजूद कुछ निजी भूमि को शासकीय भूमि बताने का प्रयास किया गया। यदि ऐसा हुआ है, तो यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक संपत्ति अधिकारों पर गंभीर आघात है। और भी चिंता तब बढ़ जाती है जब नागरिकों को अपने वैध अधिकारों के लिए वर्षों तक न्यायालयों की शरण लेनी पड़े, और न्यायालय के आदेश आने के बाद भी उनके पालन में अनावश्यक विलंब या टालमटोल की शिकायतें सामने आएं। लोकतंत्र में न्यायपालिका सर्वोच्च है। न्यायालयों के आदेशों की अनदेखी केवल एक न्यायिक आदेश की अवमानना नहीं, बल्कि संविधान और विधि के शासन की भावना को भी ठेस पहुंचाती है। आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि एक सामान्य नागरिक से छोटी-सी गलती पर कठोर कार्रवाई हो सकती है, तो सरकारी अधिकारियों द्वारा किए गए कथित भ्रष्टाचार, रिकॉर्ड में हेरफेर, मनमानी, पक्षपात या न्यायालय के आदेशों की अवहेलना पर समान कठोरता क्यों नहीं दिखाई जाती? विभागीय जांच वर्षों तक चलती रहती है, जबकि जनता न्याय की प्रतीक्षा करती रहती है। सरकारी पद किसी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। इस विश्वास के साथ छल लोकतंत्र के साथ छल है। अंततः प्रश्न केवल इतना है—
फिर भी भारत आगे बढ़ रहा है। इसका श्रेय उन लाखों ईमानदार अधिकारियों, कर्मचारियों, न्यायाधीशों, उद्यमियों, किसानों, मजदूरों और करदाताओं को जाता है, जो पूरी निष्ठा से अपना दायित्व निभा रहे हैं। उनकी ईमानदारी और मेहनत ही देश की सबसे बड़ी पूंजी है।
लेकिन कल्पना कीजिए कि यदि भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण हो जाए, यदि न्यायालयों के आदेशों का तत्काल पालन हो, यदि सरकारी रिकॉर्ड से छेड़छाड़ करने वालों पर कठोर कार्रवाई हो, यदि नगर निगमों और प्रशासनिक संस्थाओं में पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित हो जाए, तो भारत की प्रगति कितनी अधिक तेज हो सकती है।
अब समय आ गया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में केवल निलंबन या वर्षों तक चलने वाली विभागीय जांच ही समाधान न मानी जाए। जहां न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध हो, वहां कठोर दंड, अवैध संपत्ति की जब्ती, सरकारी सेवा से बर्खास्तगी, जनता को हुई क्षति की भरपाई तथा न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
क्या सरकारी पद जनसेवा के लिए है या निजी संपत्ति बनाने का माध्यम?
कब तक सरकारी तंत्र का यह "अंधा कुआँ" जनता के धन, अधिकारों और विश्वास को निगलता रहेगा? कब तक "बहती गंगा" में भ्रष्टाचार का स्नान चलता रहेगा? और कब वह दिन आएगा जब कानून वास्तव में सबके लिए समान होगा—चाहे वह आम नागरिक हो या उच्च पद पर बैठा अधिकारी?