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मध्य प्रदेश: दुनिया नहीं, धर्म में है सच्ची शरण आचार्य समय सागर जी महाराज
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: गोटेगांव की धरा पर ससंघ विराजमान है, वर्तमान संघ नायक समय सागर जी महाराज आगम और गुरुओं का एक ही कहना है कि संसार में कोई सारभूत वस्तु है। तो वह परमार्थ क्षेत्र में आत्म तत्व है।
विस्तार
मध्य प्रदेश: गोटेगांव की धरा पर ससंघ विराजमान है, वर्तमान संघ नायक समय सागर जी महाराज आगम और गुरुओं का एक ही कहना है कि संसार में कोई सारभूत वस्तु है। तो वह परमार्थ क्षेत्र में आत्म तत्व है। क्योंकि यही पदार्थ अनंत है। आत्मा ज्ञान के माध्यम से स्वरूप की पहचान कर आत्म तत्व जान लेती है। कर्मों का आश्रव जो निरंतर हो रहा है।उसको रोकने के लिए परमार्थ की आवश्यकता है। बाहरी वस्तु या पदार्थ सभी नश्वर हैं। इनमें शरण नहीं है। आप पंच परमेष्ठी की शरण में सम्यक दर्शन प्राप्त करो। आपको धर्म की शरण में जाना होगा। परमार्थ का ज्ञान देने वाली यह श्रेष्ठ ज्ञानोपयोगी बात गोटेगांव नगर की धरा पर ससंघ विराजमान वर्तमान संघ नायक परम पूज्य आचार्य श्री 108 समय सागर जी महाराज ने कहीं। उन्होंने कहा कि अक्षय,अनंत सुख केवल मात्र केवल्य ज्ञान प्राप्त करना है। आपको स्वाध्याय करना चाहिए । स्वाध्याय से विवेक जागृत होता है। विवेक से ही केवल्य ज्ञान प्राप्त होता है। आपको दुनिया की शरण में नहीं बल्कि स्वयं अपनी शरण में ,धर्म की शरण में जाना चाहिए। आपको जन्म ,जरा ,मृत्यु से ऊपर उठना होगा। इसके लिए आपको धर्म की शरण में आना ही पड़ेगा ।धर्म की शरण से ही राग, द्वेष, इच्छाओं का परित्याग होता है। संकट से मुक्ति मिलती है। धर्म से मिलेगा मोक्ष सुख धर्म का स्वरूप विभिन्न रूपों में आचार्यों ने प्रतिपादित किया है। धर्म वह है जो व्यक्ति को उत्तम सुख अर्थात मोक्ष सुख की ओर ले जाता है। आप चाहो तो इस मार्ग पर चलकर सच्चे सुख को प्राप्त कर सकते हो। बालक जब तक रोता नहीं है। तब तक मां उसे दूध नहीं पिलाती है और यदि दूध पिलाने के पश्चात कुछ देर बाद वह बालक फिर रोने लगता है। तो फिर उसका यह कृत्य भूख नहीं बल्कि उसका हठ करना है। ऐसे में बच्चे को यदि कोई खिलौना या अन्य वस्तु थमा दो तो वह शांत हो जाता है। ध्यान रखें जिसकी लालसा सांसारिक सुख की है। वह मोक्ष सुख कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता। आचार्य श्री ने कहा कि भोजन करने से सुख नहीं मिलता। वह दुख का प्रतिकार मात्र है। आपको क्षुधा, भूख की बेदना हो रही थी तो वह भोजन करने से शांत हो जाती है। अक्षय, अनंत सुख तो मात्र मोक्ष सुख है, जो आस्था के ऊपर निर्धारित करता है। मोक्ष मार्ग पर चलने वाले श्रावक को आस्थाजन्य सुख प्राप्त होता है। क्योंकि उसे विश्वास होता है कि इसी मार्ग पर सच्चा सुख प्राप्त हो सकता है। सारे परिग्रह का त्याग कर दिया, यहां तक की वस्त्रो का भी त्याग कर दिया। 24 घंटे में सिर्फ एक बार आहार लेता है और आहार आदि न मिलने पर भी मन प्रसन्न रहता है। श्रेष्ठ श्रावक ही मोक्ष मार्गी होता है। उसने इंद्रियों के जानते सभी सुखों का त्याग कर दिया है। आदिनाथ भगवान आगम के ज्ञाता थे। पर उन्होंने किसी को आहार का उपदेश नहीं दिया। आहार जब मिलना होगा तब मिलेगा। कल्पवृक्ष के अभाव होने पर आदिनाथ भगवान ने ही कर्म करने का उपदेश दिया और असि ,मसि, कृषि वाणिज्य आदि की कला सिखा दी। परंतु आहार आदि का उपदेश नहीं दिया,क्योंकि याचना नहीं करना है। विधि के अनुसार प्राप्त हो जाए तो ही आहार ग्रहण करना। तीव्र कर्म के उदय पर पंच परमेष्ठी की शरण ही काम आती हैं आचार्य श्री ने कहा कि तीव्र कर्म का जब उदय होता है, तो कोई काम नहीं आता।कोई सगा नहीं होता।केवल मात्र पंच परमेष्ठी भगवान ही काम आते हैं। गुरुदेव ने एक दृष्टांत बतलाते हुए कहा कि एक राजा नदी पर पुल का निर्माण करवाता है। पुल बनता है और टूट जाता है।फिर बनता है फिर टूट जाता है। तब ज्योतिष की सलाह ली जाती है।उन्होंने बताया कि पुल बन जाएगा लेकिन बलि की आवश्यकता पड़ेगी। राजा ने घोषणा कर दी।जो भी एक बालक देगा उसे स्वर्ण का बालक बना कर देंगे। एक परिवार गरीब था। राजा की घोषणा से उसका लोभ जागृत हुआ। उसने सोचा मेरे चार बालक हैं। फिर एक बालक के प्रति लोभ क्या करना। वह एक बालक को राजा के पास ले जाते है। बालक को जानकारी मिलने पर उसकी आंखों में आंसू आते हैं। वह मां से बोला कि माता-पिता की शरण के अलावा में किधर जाऊं। तब मां बोली राजा की शरण में जाओगे तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। राजा के पास पहुंचने पर वह बालक रोना बंद कर हंसने लगता है। राजा ने पूछा तो वह बोलता है कि माता-पिता ने शरण नहीं दी तो आप भी क्या शरण दोगे। इसलिए रोना धोना क्यों करें। तब उसके मन में भाव आया और वह प्रभु की आराधना में बैठ गया। तभी आकाशवाणी हुई क्या चाहते हो। बालक बोला मुझे कुछ नहीं चाहिए जिन्हें शरण देनी थी, वह शरण नहीं दे रहे तो फिर मैं किसकी शरण में जाऊं। तब भगवान बोले तुम वापस चले जाओ।तुम्हें कोई विपत्ति नहीं आने वाली है और पुल भी बन जाता है।
धर्म ही आलंबन योग्य है अन्य कोई नहीं अब यह आप लोग सोचो कि आप दिमाग होते हुए भी,आस्था होते हुए भी किसी लक्ष्य प्राप्ति के लिए नियम विरूद्ध , धर्म विरुद्ध हो जाते हो। आप दया को छोड़ोगे तो आपकी परीक्षा होगी। आप तटस्थ होकर ऐसे विचार करते कि किसी भी प्रकार की हिंसा न हो। आप दूसरों का भला करोगे, तो ही आपका भला होगा। आप विश्व के भले की सोचो। वस्तुत: शरीर मिटने बनता है। केवल धर्म ही साथ जाएगा। शरण तो केवल पंच परमेष्टी में है।कोई अन्य बचाने वाला नहीं है। परमेष्ठी की शरण में पतित जीवन पावन हो जाएगा। यह आपको ही करना है । आप दूसरे के प्रति दया का भाव रखोगे तो तुम्हारे लिए भी दूसरे दया का भाव रखेंगे। आपको संसार सागर से पार होना है तो पंच परमेष्ठी के द्वारा ही पार हो पाओगे। आप कितना ही लौकिक ज्ञान,संपदा प्राप्त कर लो। लेकिन संसार सागर से पार तो केवल परमार्थ ज्ञान, सम्यक ज्ञान ही कर पाएगा। धर्म ही आलंबन योग्य है और इसके अलावा कोई भी आलंबन योग्य नहीं है।
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