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उत्तर प्रदेश: अब घर बैठे होगा पितरों का तर्पण, काशी में NRI के लिए शुरू हुई डिजिटल पिंडदान सेवा

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उत्तर प्रदेश  Published by: Anand Kumar (UP) , उत्तर प्रदेश  Edited By: Yashoda, Date: 24/09/2026 04:56:49 pm Share:
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  • Published by.: Anand Kumar (UP) ,
  • Edited By.: Yashoda,
  • Date:
  • 24/09/2026 04:56:49 pm
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: पितृपक्ष में अपने पूर्वजों को याद करने की परंपरा अब नई तकनीक से भी जुड़ रही है। काशी यानी वाराणसी में पितरों का तर्पण अब डिजिटल हो रहा है। हाथ में कुश, तिल और गंगाजल के साथ अब कर्मकांडी ट्राइपॉड और स्मार्टफोन के माध्यम से ई-तर्पण कर रहे हैं।

विस्तार

उत्तर प्रदेश: पितृपक्ष में अपने पूर्वजों को याद करने की परंपरा अब नई तकनीक से भी जुड़ रही है। काशी यानी वाराणसी में पितरों का तर्पण अब डिजिटल हो रहा है। हाथ में कुश, तिल और गंगाजल के साथ अब कर्मकांडी ट्राइपॉड और स्मार्टफोन के माध्यम से ई-तर्पण कर रहे हैं। विदेश में बैठे अप्रवासी भारतीय (एनआरआई), जो व्यस्तता या वीजे की अड़चनों की वजह से यहां नहीं आ पा रहे हैं, अब घर बैठे विदेश से ही वीडियो कॉल पर पूर्वजों का तर्पण कराएंगे। मौके पर काशी के कर्मकांडी ब्राह्मण ई-पिंडदान के लिए बाकायदा 5100 से लेकर 51000 रुपए तक ले रहे हैं। इसके अलावा हजारों लोग ऑनलाइन एप से भी पिंडदान करा रहे हैं। तर्पण कराने वालों ने इसके लिए अलग-अलग पैकेज लिए हैं।

 

अमेरिका, जापान, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, सिडनी और स्पेन में रहने वाले एनआरआई अभी से ही ब्राह्मणों के संपर्क में हैं। गुड़गांव, नोएडा, बंगलूरु, हरियाणा की कई कंपनियां ऑनलाइन एप और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों से संपर्क साध रही हैं। त्रिपिंडी दर्पण के लिए वह हजारों रुपए चार्ज कर रही हैं।   एप डाउनलोड करने के बाद ग्राहकों को कॉल करके तरह-तरह के ऑफर दिए जा रहे हैं। गुड़गांव से एक ऐप पर काम कर रहे सेल्स हेड के अनुसार, उनके पास अभी तक ऑनलाइन त्रिपिंडी के लिए 100 से अधिक बुकिंग हो चुकी है। इनमें करीब 20 फ़ीसदी एनआरआई हैं। अलग-अलग तरीखों पर लोग गया, काशी और हरिद्वार में अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए त्रिपिंडी करा रहे हैं। गूगल मीट एप से लोगों को जोड़कर ऑनलाइन संकल्प दिलाया जाएगा। काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रोफेसर रामनारायण द्विवेदी का कहना है कि प्राचीन काल में ऑनलाइन अथवा  एप की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। समय के साथ परिवर्तन हो रहा है। यदि कोई यजमान आने की स्थिति में नहीं है, लेकिन वह शुद्ध, मन और पवित्रता से संकल्प लेकर पितरों का तर्पण करता है, तो इसका भी फल उसे उतना ही मिलेगा जितना भौतिक रूप से उपस्थित होकर मिलता है।