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बिहार: राजा नाहर सिंह का बलिदान आज भी देता है, देशभक्ति और स्वाभिमान की प्रेरणा

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बिहार  Published by: Sanjay Kumar Verma , बिहार  Edited By: Namita Chauhan, Date: 11/06/2026 12:31:29 pm Share:
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  • Published by.: Sanjay Kumar Verma ,
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संक्षेप

बिहार: फरीदाबाद जिले की बल्लभगढ़ रियासत के अंतिम शासक एवं स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा राजा नाहर सिंह का नाम भारतीय इतिहास में साहस, देशभक्ति और बलिदान के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। 

विस्तार

बिहार: फरीदाबाद जिले की बल्लभगढ़ रियासत के अंतिम शासक एवं स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा राजा नाहर सिंह का नाम भारतीय इतिहास में साहस, देशभक्ति और बलिदान के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। उनका जन्म वर्ष 1823 में हुआ था और कम उम्र में ही उन्होंने बल्लभगढ़ रियासत की बागडोर संभाली। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राजा नाहर सिंह ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध खुलकर मोर्चा संभाला। उन्होंने दिल्ली में मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र का समर्थन किया और क्रांतिकारियों को हर संभव सहायता प्रदान की। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनकी वीरता और नेतृत्व क्षमता के कारण उन्हें “बल्लभगढ़ का शेर” भी कहा जाता है।

अंग्रेजों ने क्रांति को दबाने के बाद राजा नाहर सिंह को छलपूर्वक गिरफ्तार कर लिया। उन पर अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह का आरोप लगाया गया। मुकदमे के बाद उन्हें मृत्युदंड सुनाया गया और 9 जनवरी 1858 को दिल्ली के चांदनी चौक में फांसी दे दी गई। उस समय उनकी आयु लगभग 35 वर्ष थी। उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अमिट अध्याय बन गया। आज भी उनकी स्मृति में बल्लभगढ़ स्थित नाहर सिंह महल ऐतिहासिक धरोहर के रूप में मौजूद है। वहीं, दिल्ली मेट्रो की वायलेट लाइन का अंतिम स्टेशन राजा नाहर सिंह (बल्लभगढ़) मेट्रो स्टेशन उनके सम्मान में नामित किया गया है। राजा नाहर सिंह का जीवन देशप्रेम, स्वाभिमान और राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान की प्रेरक गाथा है। देश हमेशा इस महान क्रांतिकारी नायक के योगदान को श्रद्धापूर्वक याद करता रहेगा।


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