Contact for Advertisement 9650503773


मध्य प्रदेश: राहुल नवरंग ने कैडर में बताया बौद्ध धर्म में कमल का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

- Photo by : social media

मध्य प्रदेश  Published by: Fulchand Malviya , मध्य प्रदेश  Edited By: Kunal, Date: 04/07/2026 04:50:46 pm Share:
  • मध्य प्रदेश
  • Published by.: Fulchand Malviya ,
  • Edited By.: Kunal,
  • Date:
  • 04/07/2026 04:50:46 pm
Share:

संक्षेप

मध्य प्रदेश: महाराजा बलि सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल नवरंग ने संगठन के राष्ट्रीय कैडर में बौद्ध विरासत और इतिहास पर विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि इतिहास का अध्ययन करते समय एक बात हमेशा याद र

विस्तार

मध्य प्रदेश: महाराजा बलि सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल नवरंग ने संगठन के राष्ट्रीय कैडर में बौद्ध विरासत और इतिहास पर विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि इतिहास का अध्ययन करते समय एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कोई भी प्रतीक हर दौर में एक जैसा अर्थ नहीं रखता समय बदलता है, समाज बदलता है, और समाज के साथ-साथ उसी प्रतीक के अर्थ, उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति और दार्शनिक मान्यताएँ भी बदलती रहती हैं। बौद्ध धर्म में कमल (पद्म) इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण है।  प्रारंभिक बौद्ध काल अनाइकोनिक चरण राहुल नवरंग ने कैडर में बताया कि प्रारंभिक बौद्ध काल में बुद्ध की मानव आकृति वाली मूर्तियाँ नहीं बनाई जाती थीं उस समय बुद्ध को धर्मचक्र, बोधि वृक्ष, बुद्ध के चरणचिह्न, स्तूप और खाली सिंहासन जैसे प्रतीकों के माध्यम से दर्शाया जाता था इसी काल में कमल मुख्य रूप से एक पवित्र प्राकृतिक और सजावटी प्रतीक के रूप में दिखाई देता है स्तूपों, पत्थर की नक्काशी और विभिन्न कलात्मक सजावटों में कमल का उपयोग किया गया उस समय यह प्रकृति की पवित्रता और निर्मलता का प्रतीक माना जाता था। 


महायान बौद्ध काल महायान बौद्ध धर्म के विकास के साथ कमल का महत्व और भी बढ़ गया अब वह केवल एक सुंदर फूल नहीं रहा वह बन गया— ज्ञान, प्रज्ञा, करुणा, बोधि और मुक्ति का प्रतीक इसी कारण महायान बौद्ध साहित्य में कमल को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान मिला बुद्ध और बोधिसत्त्वों को कमलासन पर विराजमान दिखाया जाने लगा कमल धर्म के विकास और ज्ञान के प्रस्फुटन का प्रतीक बन गया बोधिसत्त्व परंपरा में कमल महायान काल में अवलोकितेश्वर, तारा और मंजुश्री जैसे बोधिसत्त्वों के हाथों में कमल दिखाई देने लगा यह एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था प्रकृति का एक साधारण फूल अब करुणा, प्रज्ञा, बोधि और लोककल्याण जैसे सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों का प्रतीक बन गया वज्रयान काल में कमल वज्रयान बौद्ध धर्म में कमल को और भी गहरा आध्यात्मिक अर्थ मिला मंडलों में, ध्यान की परंपराओं में, मानसिक साधनाओं में, योग परंपराओं में और प्रतीकों के स्वरूपों में—हर जगह कमल ने एक केंद्रीय स्थान प्राप्त किया अष्टदल कमल, षोडशदल कमल और सहस्रदल कमल जैसे रूप इसी काल में व्यापक रूप से दिखाई देने लगे। 


बौद्ध वास्तुकला में कमल महायान और वज्रयान काल में चैत्य, विहार, बोधिसत्त्व मंदिर, स्तंभ, छतें, छत के पत्थर, सिंहासन और मंडलों में कमल की नक्काशी बड़े पैमाने पर की गई यह केवल सजावट नहीं थी यह पत्थर पर उकेरा गया एक दार्शनिक संदेश था मानव का ज्ञान भी कमल की तरह खिलना चाहिए बाद की भारतीय मंदिर परंपरा बाद के समय में जब भारत में मंदिर निर्माण का विस्तार हुआ, तब सदियों से विकसित हो चुकी अनेक कलात्मक, वास्तु और प्राकृतिक प्रतीकों को नए वैचारिक अर्थों के साथ अपनाया गया कमल भी उन्हीं प्रतीकों में से एक था मंदिरों की छतों, स्तंभों, शिखरों, वेदिकाओं और गर्भगृहों में कमल व्यापक रूप से दिखाई देने लगा यह परिवर्तन एक दिन में नहीं हुआ, बल्कि कई सदियों तक चली सांस्कृतिक और कलात्मक प्रक्रिया का परिणाम था
राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल नवरंग ने कैडर के दौरान अंत में यह स्पष्ट किया कि इतिहास हमें एक महत्वपूर्ण बात सिखाता है पहले प्रकृति आई, फिर प्रकृति से प्रतीक बने, उसके बाद मनुष्य ने उन प्रतीकों को अर्थ दिए बौद्ध धर्म ने प्रकृति में मौजूद कमल को मानव ज्ञान, करुणा, निर्मलता और मुक्ति का प्रतीक बनाया बाद में भारतीय कला और वास्तुकला की विभिन्न परंपराओं ने भी अपने-अपने संदर्भों में कमल को अपनाया और आगे बढ़ाया इसलिए कमल का इतिहास केवल एक फूल का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता में विचार, कला, वास्तुकला और दर्शन के क्रमिक विकास की एक महान सांस्कृतिक यात्रा है। 


Featured News