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राजस्थान: National Highways Authority of India (NHAI) और 75 मीटर का नियम: जिम्मेदारी किसकी?
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संक्षेप
राजस्थान: राष्ट्रीय राजमार्ग के आसपास 75 मीटर तक निर्माण को प्रतिबंधित या नियंत्रित क्षेत्र माना जाता है, तब सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होता कि नियम क्या है बल्कि यह होता है कि उस नियम की जानकारी किसे थी और किसे नहीं।
विस्तार
राजस्थान: राष्ट्रीय राजमार्ग के आसपास 75 मीटर तक निर्माण को प्रतिबंधित या नियंत्रित क्षेत्र माना जाता है, तब सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होता कि नियम क्या है बल्कि यह होता है कि उस नियम की जानकारी किसे थी और किसे नहीं। अगर आम लोगों को इन नियमों की पूरी जानकारी नहीं थी, तो यह मान भी लिया जाए, गांव का किसान, छोटा व्यापारी, ढाबा चलाने वाला परिवार वे कानून की हर धारा पढ़कर जमीन नहीं खरीदते। वे भरोसा करते हैं सरकारी दफ्तरों पर लेकिन…क्या सरकारी अधिकारियों को भी नियमों की जानकारी नहीं थी? जब अनुमति मिली, तब भरोसा भी मिला तहसील कार्यालय में रजिस्ट्री हुई नगर पालिका ने पट्टा जारी किया भवन निर्माण की स्वीकृति दी गई नक्शा पास हुआ टैक्स वसूला गया तो स्वाभाविक है कि नागरिक ने यह माना कि सब कुछ वैध है। कोई भी व्यक्ति अपनी जीवन भर की कमाई ऐसी जमीन पर नहीं लगाता जिसे वह जानता हो कि वह अवैध है। अगर 75 मीटर का नियम लागू था तो फिर सवाल उठता है: रजिस्ट्री क्यों की गई? पट्टे क्यों जारी हुए? भवन निर्माण की स्वीकृति क्यों दी गई? सालों तक कर क्यों वसूला गया? जिम्मेदारी की असली रेखा राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ी भूमि केवल स्थानीय निकाय का विषय नहीं होती। यह NHAI, राज्य सरकार, राजस्व विभाग और शहरी निकायों के समन्वय का विषय है। यदि नियम लागू था और फिर भी अनुमति दी गई तो या तो: विभागों के बीच समन्वय की कमी थी रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं थे या प्रशासनिक स्तर पर गंभीर लापरवाही हुई
क्योंकि कानून की जानकारी नागरिक से पहले अधिकारी को होनी चाहिए। 2007 से पहले की संपत्तियाँ — उनका क्या? यदि किसी व्यक्ति ने 2007 से पहले रजिस्ट्री करवाई, जब स्पष्ट रूप से 75 मीटर का नियम लागू नहीं था या स्थानीय स्तर पर लागू नहीं कराया जा रहा था तो नैतिक और कानूनी दृष्टि से उसकी स्थिति अलग मानी जानी चाहिए। कानून का मूल सिद्धांत कहता है: जिस समय जो नियम प्रभावी था, उसी आधार पर वैधता तय होगी।” दर्द सिर्फ निर्माण का नहीं, विश्वास का है आज जब नोटिस दिए जाते हैं, बुलडोज़र की चर्चा होती है, तो केवल दीवारें नहीं टूटतीं टूटता है वह विश्वास, जो नागरिक ने सरकारी मुहर पर किया था। यदि नियम था तो पालन पहले दिन से क्यों नहीं हुआ? यदि नियम नहीं था तो बाद में लागू करते समय पूर्व वैध संपत्तियों को संरक्षण क्यों नहीं? एक सीधा सवाल अगर आम नागरिक अनजान था, तो उसे दोषी ठहराना आसान है। पर यदि अधिकारी जानते थे और फिर भी अनुमति दी
तो जवाबदेही तय किसकी होगी? राष्ट्रीय राजमार्ग देश की धमनियाँ हैं पर नागरिकों का विश्वास लोकतंत्र की आत्मा है। सड़क चौड़ी होनी चाहिए, पर न्याय उससे भी चौड़ा होना चाहिए।