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मध्य प्रदेश: श्री नागाजी सरोवर में भागवत कथा का दूसरा दिन, श्रद्धालुओं की उमड़ी भारी भीड़
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: पोरसा क्षेत्र के श्री नागाजी सरोवर परिसर में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में आज दूसरे दिन भक्तिमय वातावरण के बीच श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी,, श्री नागाजी महाराज के भक्तों के द्वारा आयोजित 51 कुंडिया अष्टोत्तर बिष्णु महायज्ञ के तहत श्रीमद् भागवत कथा जिसमें प्रसिद्ध कथावाचक पंडित श्री कृष्ण चंद्र ठाकुर जी महाराज ने अपने प्रवचनों से भक्तों को धर्म और जीवन का गूढ़ ज्ञान दे रहे हैं।
विस्तार
मध्य प्रदेश: पोरसा क्षेत्र के श्री नागाजी सरोवर परिसर में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में आज दूसरे दिन भक्तिमय वातावरण के बीच श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी,, श्री नागाजी महाराज के भक्तों के द्वारा आयोजित 51 कुंडिया अष्टोत्तर बिष्णु महायज्ञ के तहत श्रीमद् भागवत कथा जिसमें प्रसिद्ध कथावाचक पंडित श्री कृष्ण चंद्र ठाकुर जी महाराज ने अपने प्रवचनों से भक्तों को धर्म और जीवन का गूढ़ ज्ञान दे रहे हैं। कथा के दौरान श्री कृष्ण चंद्र ठाकुर जी महाराज ने कहा कि “भगवान की सेवा-पूजा और माता-पिता की सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती। जो व्यक्ति अपने माता-पिता को ही भगवान मानकर उनकी सेवा करता है, उसका यह जीवन और अगला जन्म दोनों सुखमय हो जाते हैं।” उन्होंने समाज में बढ़ती दूरियों पर चिंता जताते हुए कहा कि आज भाईचारे की भावना कमजोर हो रही है, जबकि भाई-भाई में प्रेम और मानवता ही सच्चे धर्म की पहचान है। आज की कथा के मुख्य प्रसंग (विस्तार से) एक बार जंगल में प्यास और थकान के कारण उन्होंने ऋषि शमीक के गले में मृत सर्प डाल दिया। ऋषि के पुत्र श्रंगी ऋषि ने क्रोधित होकर परीक्षित को श्राप दिया कि 7 दिन में तक्षक नाग के डसने से उनकी मृत्यु होगी। यह घटना सिखाती है कि क्रोध और अहंकार में किया गया छोटा सा अपराध भी बड़े परिणाम दे सकता है। सुखदेव जी का आगमन श्राप मिलने के बाद राजा परीक्षित ने सब कुछ त्यागकर गंगा तट पर भगवान की शरण ली। तभी महान ज्ञानी संत सुखदेव जी वहां पहुंचे और उन्होंने 7 दिनों तक राजा परीक्षित को श्रीमद् भागवत कथा सुनाई। इस कथा श्रवण के माध्यम से परीक्षित को मोक्ष की प्राप्ति हुई। संदेश: सच्चे संत का मार्गदर्शन और श्रद्धा से कथा सुनना जीवन को बदल सकता है। कथा का संदेश
नारद–व्यास संवाद श्री कृष्ण चंद्र ठाकुर जी महाराज ने बताया कि महर्षि नारद और वेदव्यास के बीच हुआ संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण है। वेदव्यास जी ने जब वेदों और पुराणों की रचना के बाद भी मन में अशांति महसूस की, तब नारद जी ने उन्हें भगवान की लीलाओं का वर्णन करने की प्रेरणा दी। इसी प्रेरणा से श्रीमद् भागवत महापुराण की रचना हुई, जो भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का संगम है। संदेश: केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि भगवान की भक्ति ही जीवन को पूर्ण बनाती है। भीष्म स्तुति महाभारत युद्ध के बाद जब भीष्म पितामह शरशैया पर लेटे थे, तब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की। उन्होंने अपने अंतिम समय में भगवान का ध्यान करते हुए उपदेश दिया कि जीवन का अंतिम लक्ष्य ईश्वर स्मरण होना चाहिए। यह प्रसंग सिखाता है कि मृत्यु के समय भी यदि मन भगवान में लगे, तो मोक्ष की प्राप्ति संभव है।
राजा परीक्षित को श्राप कैसे मिला श्री कृष्ण चंद्र ठाकुर जी महाराज ने बताया कि राजा परीक्षित, अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु के पुत्र थे।
पंडित कृष्ण चंद्र ठाकुर जी महाराज ने स्पष्ट कहा कि: भगवान की भक्ति जीवन को सरल और सुखमय बनाती है। माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। समाज में प्रेम, भाईचारा और मानवता बनाए रखना आवश्यक है। इस धार्मिक आयोजन की व्यवस्थाएं समस्त भक्तों द्वारा मिलकर संभाली जा रही हैं। पोरसा में चल रही यह भागवत कथा न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि समाज को संस्कार, सेवा और सद्भाव का संदेश देने का एक सशक्त माध्यम बन रही है। उक्त आयोजन में 51 कुंडिया अष्टोत्तर पितृ मोक्ष विष्णु महायज्ञ में आज आचार्य चेतन शर्मा बेदाचार्य एवं डॉक्टर दिलीप शास्त्री के द्वारा हवन में आहुतियां दिलवाई गई पहले आहुतियां दिलवाने के बाद मूल पाठ शुरू हुए उसके बाद श्रीमद् भागवत कथा शुरू हुई व्यवस्थाएं सभी भक्तगण देख रहे हैं।
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