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बिहार: दरगाह “उर्स-ए-ख्वाजा” में हजारों श्रद्धालुओं ने लिया भाग

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बिहार  Published by: Sajid Hossain , Date: 05/01/2026 04:04:49 pm Share:
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  • 05/01/2026 04:04:49 pm
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संक्षेप

बिहार: आज रविवार को नरहट प्रखंड क्षेत्र के ग्राम शेखपुरा स्थित दरगाह हज़रत ख्वाजा अब्दुल्ला चिश्ती पर आयोजित “उर्स-ए-ख्वाजा” पूरी श्रद्धा, अकीदत और सूफियाना माहौल के बीच सम्पन्न हुआ।

विस्तार

बिहार: आज रविवार को नरहट प्रखंड क्षेत्र के ग्राम शेखपुरा स्थित दरगाह हज़रत ख्वाजा अब्दुल्ला चिश्ती पर आयोजित “उर्स-ए-ख्वाजा” पूरी श्रद्धा, अकीदत और सूफियाना माहौल के बीच सम्पन्न हुआ। इस पावन अवसर पर दूर-दराज़ से आए हजारों श्रद्धालुओं ने दरगाह पर हाज़िरी लगाई, चादरपोशी की, फातिहा पढ़ी और अमन-चैन, भाईचारे तथा अपने-अपने जीवन की खुशहाली के लिए मुरादें मांगीं। उर्स के दौरान दरगाह परिसर “या ख्वाजा या ख्वाजा" की सदाओं से गूंज उठा। सूफी परंपरा की रूहानियत ने हर दिल को छुआ और यह संदेश दिया कि इबादत के साथ इंसानियत, प्रेम और सद्भाव ही असल रास्ता है। उर्स में सभी समुदायों के लोगों की सहभागिता ने गंगा-जमुनी तहज़ीब को एक बार फिर जीवंत कर दिया। इस ऐतिहासिक और रूहानी आयोजन के मुख्य अतिथि , ज़िला सुननी वक़्फ़ बोर्ड नवादा के चेयरमैन, जनाब फख्र उद्दीन अली अहमद उर्फ़ चामो जी रहे। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि उर्स जैसे आयोजन समाज को जोड़ने, नफ़रत को मिटाने और प्रेम, सेवा व भाईचारे की भावना को मजबूत करने का काम करते हैं। उन्होंने दरगाह की रिवायती और साझा विरासत को संजोए रखने और सामाजिक सौहार्द को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।


शिविर के आयोजक शमीम उद्दीन अंसारी, सदस्य ज़िला औक़ाफ़ कमिटी नवादा ने उर्स के ऐतिहासिक और रूहानी महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि हज़रत ख़्वाजा अब्दुल्ला चिश्ती प्राचीन सूफ़ी परंपरा के महान बुज़ुर्ग थे, जो मखदूम-ए-जहां (1263–1381) के दौर से जुड़ता है। यह वही सूफ़ी परंपरा है जिसने प्रेम, त्याग, सहिष्णुता और इंसानियत का पैग़ाम देकर समाज को दिशा दिखाई। उन्होंने बताया कि उर्स के अवसर पर दरगाह परिसर में सूफ़ियाना कव्वाली, दुआओं और चिकित्सा शिविर, लंगर-ए-आम, अलाह और झूले जैसे आयोजनों ने मेले को चार चांद लगा दिए। रात भर कव्वाली की रूहानी धुनों ने माहौल को ऐसा बांध दिया कि हर ज़ायरीन की आंखें नम और दिल सुकून से भर गया। बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर चेहरे पर आस्था और खुशी की झलक साफ़ दिखाई दी। ज़िला औक़ाफ कमिटी सदस्य साजिद हुसैन ने  कहा कि उर्स केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और गंगा-जमुनी तहज़ीब का जीवंत उदाहरण है, जहां मज़हब की दीवारें टूटती हैं और इंसानियत सबसे ऊपर नज़र आती है। ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी को सूफ़ी संतों की शिक्षाओं—अमन, भाईचारे और सेवा—से जुड़ने की प्रेरणा मिलती है। स्थानीय प्रबंधन समिति और स्वयंसेवकों की सराहनीय व्यवस्था के कारण उर्स शांतिपूर्ण एवं सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ। कुल मिलाकर, ग्राम शेखपुरा का यह उर्स केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, रूहानियत और इंसानी मूल्यों का जीवंत प्रतीक बनकर उभरा—जहां हर मज़हब, हर वर्ग के लोग एक साथ दुआओं में शामिल हुए और अमन का पैग़ाम दुनिया तक पहुँचाया। मौक़े पे उपस्थि शेखपुरा पैक्स अध्यक्ष सह मुखिया प्रतिनिधि सत्येंद्र सिंह नरहट मुखिया एहतेशाम क़ैसर उर्फ़ गुड्डू जमुआरा पंचायत मुखिया संजय सिंह तहसीन आलम महबूब काज़मी आफ़ताब मंसूरी ओसामा खालिद रिज़वान अख़्तर हसीबुल रसीद शमीम नाज़ मोहम्मद क़ैसर इत्यादि थे। 

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