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Delhi High Court: उम्रकैद के आरोपी ने की रिहाई की मांग, हाई कोर्ट ने बढ़ाई  सुनवाई की तारीख 

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शिखा पांडेय दिल्ली   Published by: , शिखा पांडेय दिल्ली   Edited By: Kunal, Date: 17/04/2026 03:15:05 pm Share:
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  • 17/04/2026 03:15:05 pm
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संक्षेप

दिल्ली: प्रियदर्शिनी मट्टू दुष्कर्म और हत्या के मामले में उम्र कैद की सजा काट रहे अभियुक्त संतोष कुमार सिंह ने समय से पहले सजा खत्म करने की मांग की थी। 

विस्तार

दिल्ली: प्रियदर्शिनी मट्टू दुष्कर्म और हत्या के मामले में उम्र कैद की सजा काट रहे अभियुक्त संतोष कुमार सिंह ने समय से पहले सजा खत्म करने की मांग की थी। इस पर हाई कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि दोषी भले ही बदनाम है, लेकिन फैसला कानून से होगा।दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को 1996 के प्रियदर्शिनी मट्टू दुष्कर्म और हत्या के मामले में उम्र कैद की सजा काट रहे अभियुक्त संतोष कुमार सिंह को भरोसा दिलाया है की तय समय से पहले रिहाई के मुद्दे पर उनके साथ 'निष्पक्ष व्यवहार' किया जाएगा। अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि सजा समीक्षा बोर्ड (SRB) 'जनता की धारणा' के आधार पर आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस अनूप जे. भंभानी के अनुसार इसमें कोई संदेह नहीं है कि अपराध जघन्य था और मृतक के परिवार ने अपरिवर्तनीय क्षति झेली है , लेकिन सजा समीक्षा बोर्ड समय से पहले रिहाई की याचिकाओं पर इस तरह फैसला ले रहा है, जैसे आंखों पर पट्टी बांधे हुई 'लेडी जस्टिस' हो। जज ने मौखिक रूप से कहा, 'सेंटेंस रिव्यू बोर्ड पब्लिक परसेप्शन के आधार पर आगे बढ़ता दिख रहा है। आप एक बेहद अलोकप्रिय व्यक्ति हैं और SRB चीजों को वैसे ही देख रहा है, जैसे 'लेडी जस्टिस' मूल रूप से आंखों पर पट्टी बांधकर देखती थीं कि आपका नाम सुनने में अच्छा नहीं लग रहा, इसलिए मैं इसे खारिज कर रहा हूं। 

अदालत ने कहा है कि वह SRB द्वारा कैदियों की समय से पूर्व रिहाई की आर्ज़ियों को खारिज किए जाने से जुड़े कई अन्य मामलों की सुनवाई कर रहे है और संतोष कुमार सिंह की अर्ज़ी की भी 20 अप्रैल को सभी ऐसी ही आर्ज़ियों के साथ ही सुनवाई होगी। अदालत संतोष कुमार सिंह की उस अर्जी पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने अपनी याचिका पर सुनवाई की तारीख 18 मई से पहले सुनवाई करने का अनुरोध किया था। दोषी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मोहित माथुर ने दलील दी किसंतोष कुमार सिंह पिछले 31 वर्षों से हिरासत में हैं। पिछली बार उनकी याचिका खारिज होने के बाद हाई कोर्ट द्वारा विस्तृत निर्णय दिए जाने के बावजूद SRB ने उन्हीं आधारों पर फिर से उनका मामला अस्वीकार कर दिया। इस पर जस्टिस भंभानी ने कहा कि इससे भी अधिक गंभीर उदाहरण सामने आए हैं, जिनमें कुछ कैदी 41 साल से हिरासत में हैं, क्योंकि विपरीत सिफारिशों के बावजूद SRB अपराध की गंभीरता के आधार पर मामलों को लगातार खारिज कर रहा है। हलाकि हाई कोर्ट अभी भी पुरे मामले पर नज़र बनाए हुए हैं। 

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