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राजस्थान: उदयपुर में अरावली संरक्षण पर हाई-पावर्ड कमेटी की सुनवाई, खनन और पर्यावरण पर मंथन
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संक्षेप
राजस्थान: संरक्षण के साथ स्थानीय रोजगार और छोटे खनन पट्टाधारकों के हितों की सुरक्षा का मुद्दा प्रमुखता से उठा अरावली पर्वतमाला की परिभाषा, सीमांकन, संरक्षण, पर्यावरणीय संतुलन, प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग तथा खनन गतिविधियों से जुड़े
विस्तार
राजस्थान: संरक्षण के साथ स्थानीय रोजगार और छोटे खनन पट्टाधारकों के हितों की सुरक्षा का मुद्दा प्रमुखता से उठा अरावली पर्वतमाला की परिभाषा, सीमांकन, संरक्षण, पर्यावरणीय संतुलन, प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग तथा खनन गतिविधियों से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित हाई-पावर्ड कमेटी की ओर से सोमवार को उदयपुर में सार्वजनिक हितधारक परामर्श कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिला परिषद सभागार में आयोजित इस महत्वपूर्ण बैठक में उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जैन, उदयपुर ग्रामीण विधायक फूलसिंह मीणा, जिला कलेक्टर गौरव अग्रवाल, खान एवं भूविज्ञान विभाग के अधिकारी, विभिन्न सामाजिक एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि, खनन व्यवसायी, पट्टाधारक, पर्यावरण विशेषज्ञ तथा अन्य संबंधित हितधारक मौजूद रहे। अवैध खनन के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो, लेकिन वैध पट्टाधारकों के अधिकारों एवं निवेश को भी संरक्षण मिलना चाहिए। छोटे पट्टाधारकों का मुद्दा प्रमुखता से उठा बैठक में विशेष रूप से चिंता व्यक्त की गई कि यदि अरावली से संबंधित नई व्यवस्था अत्यधिक केंद्रीकृत अथवा बड़े स्तर की हो गई तो छोटे स्थानीय खनन पट्टाधारक प्रतिस्पर्धा से बाहर हो सकते हैं। व्यवसायियों ने कहा कि छोटे पट्टों पर स्थानीय लोगों की पूंजी लगी हुई है और इनके माध्यम से बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है। इसलिए नीति बनाते समय छोटे पट्टाधारकों के आर्थिक एवं सामाजिक प्रभाव का भी अध्ययन किया जाए। व्यवसाय के केंद्रीकरण से बचाने की मांग हितधारकों ने यह भी सुझाव दिया कि संरक्षण के नाम पर ऐसी व्यवस्था न बने जिससे स्थानीय छोटे उद्यमियों के लिए अवसर समाप्त हो जाएं और खनन एवं निर्माण सामग्री का व्यवसाय कुछ बड़े समूहों तक सीमित होकर रह जाए। ड्रोन सर्वे और वैज्ञानिक सीमांकन पर भी चर्चा बैठक में अरावली क्षेत्र के सीमांकन के लिए ड्रोन, GIS, सैटेलाइट इमेजरी एवं अन्य आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि अरावली की प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुंचने का प्रभाव केवल संबंधित खनन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर जल स्रोतों, भूजल, वनस्पति और आसपास के जनजीवन पर दीर्घकालीन रूप से पड़ सकता है। 1. अरावली का वैज्ञानिक एवं विस्तृत सीमांकन किया जाए। 2. वैध एवं अवैध खनन में स्पष्ट अंतर किया जाए। 3. छोटे खनन पट्टाधारकों के हितों की रक्षा की जाए। 4. ड्रोन एवं डिजिटल सर्वे के साथ मौके पर भौतिक सत्यापन हो। 5. प्रत्येक क्षेत्र की पर्यावरणीय संवेदनशीलता का अलग-अलग अध्ययन किया जाए। 6. स्थानीय रोजगार एवं आजीविका पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन हो। 7. संवेदनशील क्षेत्रों को स्पष्ट नो-गो क्षेत्र बनाया जाए। 8. जहां नियंत्रित खनन वैज्ञानिक रूप से संभव हो, वहां कड़े पर्यावरणीय मानकों के साथ अनुमति पर विचार हो। 9. अवैध खनन पर सख्त कार्रवाई हो। 10. खनन के बाद भूमि पुनर्वास एवं पर्यावरण पुनर्स्थापन अनिवार्य किया जाए। 11. जलग्रहण एवं भूजल पुनर्भरण क्षेत्रों को विशेष संरक्षण दिया जाए। 12. नीति निर्माण में स्थानीय लोगों एवं प्रभावित हितधारकों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। 13. ऐसी व्यवस्था से बचा जाए जिससे वैध खनन व्यवसाय का अत्यधिक केंद्रीकरण हो। 14. अंतिम निर्णय से पहले प्रभावित पक्षों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिले। उच्च स्तरीय समिति के समक्ष उदयपुर की आवाज
सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली की वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय दृष्टि से व्यापक समीक्षा के लिए पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड कमेटी गठित की है। कमेटी की अध्यक्ष कंचन देवी, महानिदेशक, ICFRE हैं। इसके सदस्यों में डॉ. सुभाष अशुतोष, पूर्व महानिदेशक, Forest Survey of India; डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा, पूर्व निदेशक, Geological Survey of India; बृज मोहन सिंह राठौड़, पूर्व संयुक्त सचिव, पर्यावरण मंत्रालय तथा प्रो. अशोक के. भटनागर, पूर्व विभागाध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान, दिल्ली विश्वविद्यालय शामिल हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रो. जगदीश कृष्णास्वामी एवं प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा को विशेष आमंत्रित के रूप में भी जोड़ा है।
विशेष सार्वजनिक परामर्श का उद्देश्य अरावली क्षेत्र की वास्तविक जमीनी परिस्थितियों को समझना तथा विभिन्न वर्गों के सुझावों को समिति की विचार प्रक्रिया में शामिल करना रहा। समिति के दौरे के दौरान पर्यावरण, जल संसाधन, जैव विविधता, भूमि उपयोग, खनन गतिविधियों तथा स्थानीय समुदायों की आजीविका जैसे विषयों को विशेष रूप से देखा जा रहा है। समिति से विभिन्न हितधारकों के सुझाव लेकर उन्हें अपनी रिपोर्ट में शामिल करने की अपेक्षा की गई है। बैठक में “अरावली संरक्षण भी हो और स्थानीय लोगों की आजीविका भी सुरक्षित रहे” की भावना के साथ विभिन्न पक्षों ने अपने तर्क एवं सुझाव रखे। खनन व्यवसायियों ने रखे कई महत्वपूर्ण तर्क बैठक में खनन व्यवसायियों एवं खनन पट्टाधारकों की ओर से कहा गया कि वे अरावली संरक्षण के विरोध में नहीं हैं, बल्कि वैज्ञानिक, पारदर्शी और व्यावहारिक संरक्षण व्यवस्था चाहते हैं। वैध और अवैध खनन में स्पष्ट अंतर की मांग खनन व्यवसायियों ने कहा कि वैध स्वीकृतियों के साथ संचालित खनन गतिविधियों को अवैध खनन के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
खनन व्यवसायियों की ओर से सुझाव दिया गया कि तकनीकी सर्वेक्षण महत्वपूर्ण है, लेकिन सिर्फ डिजिटल अथवा ड्रोन सर्वे के आधार पर अंतिम निर्णय नहीं लिया जाए। प्रत्येक विवादित क्षेत्र का मौके पर भौतिक सत्यापन किया जाए और संबंधित भूमि के दस्तावेजों, राजस्व रिकॉर्ड, भूगर्भीय संरचना तथा वास्तविक स्थिति का भी परीक्षण किया जाए। साथ ही संबंधित पट्टाधारक अथवा प्रभावित व्यक्ति को सर्वे रिपोर्ट के संबंध में आपत्ति एवं अपना पक्ष रखने का अवसर दिए जाने की मांग की गई। पर्यावरण विशेषज्ञों ने अरावली को बताया प्राकृतिक सुरक्षा कवच दूसरी ओर पर्यावरण विशेषज्ञों एवं संरक्षण से जुड़े प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि अरावली केवल खनिज संसाधन का क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता, वनस्पति, जलवायु संतुलन और स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संवेदनशील क्षेत्रों में पूर्ण संरक्षण की मांग पर्यावरण विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि जिन क्षेत्रों की पर्यावरणीय संवेदनशीलता अधिक है, उन्हें स्पष्ट रूप से नो-गो क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया जाए। जहां वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर नियंत्रित गतिविधि संभव हो, वहां भी पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन, जल संरक्षण, भूमि पुनर्वास और खदान बंद होने के बाद पुनर्स्थापन की बाध्यकारी व्यवस्था हो। संचयी प्रभाव का अध्ययन हो विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि किसी एक खदान के प्रभाव को देखने के बजाय पूरे क्षेत्र में मौजूद खनन गतिविधियों के संचयी पर्यावरणीय प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है विधायकों ने स्थानीय हितों को प्राथमिकता देने पर जोर दिया बैठक में उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जैन एवं उदयपुर ग्रामीण विधायक फूलसिंह मीणा की मौ
सर्वोच्च न्यायालय ने हाई-पावर्ड कमेटी को अरावली की परिभाषा एवं सीमांकन से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों की स्वतंत्र समीक्षा करने तथा संबंधित हितधारकों से परामर्श करने का दायित्व दिया है। समिति को अपनी व्यापक रिपोर्ट 31 अगस्त 2026 तक प्रस्तुत करनी है।
ऐसे में उदयपुर की यह सार्वजनिक बैठक महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यहां पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ खनन व्यवसाय, स्थानीय रोजगार और जमीनी परिस्थितियों से जुड़े पक्ष सीधे समिति के समक्ष रखे गए। बैठक का संदेश स्पष्ट रहा “अरावली सुरक्षित रहे, पर्यावरण एवं जल संसाधन सुरक्षित रहें, लेकिन संरक्षण की नीति बनाते समय स्थानीय लोगों की आजीविका, वैध व्यवसाय और छोटे उद्यमियों के हितों की भी अनदेखी न हो।” उदयपुर में हुए इस व्यापक परामर्श से उम्मीद जगी है कि अरावली के भविष्य को लेकर बनने वाली नीति वैज्ञानिक तथ्यों, पर्यावरणीय सुरक्षा, स्थानीय परिस्थितियों और जनहित—चारों के संतुलन पर आधारित होगी।
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