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उत्तर प्रदेश: सावन में महंगाई की मार,व्रत की थाली हुई महंगी, नारियल से लेकर किशमिश तक बढ़े दाम

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उत्तर प्रदेश  Published by: Irshad ahmad , उत्तर प्रदेश  Edited By: Kunal Tewatia, Date: 03/08/2026 11:42:33 am Share:
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  • Edited By.: Kunal Tewatia,
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  • 03/08/2026 11:42:33 am
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: सावन के पवित्र महीने में जहां मंदिरों और शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ रही है, वहीं व्रत रखने वालों की रसोई पर महंगाई का असर भी साफ दिखाई देने लगा है।

विस्तार

उत्तर प्रदेश: सावन के पवित्र महीने में जहां मंदिरों और शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ रही है, वहीं व्रत रखने वालों की रसोई पर महंगाई का असर भी साफ दिखाई देने लगा है। लगातार बारिश के चलते आपूर्ति प्रभावित होने और मांग बढ़ने से व्रत में इस्तेमाल होने वाली खाद्य सामग्री के दामों में पिछले दो सप्ताह के दौरान उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बाजार के व्यापारियों के अनुसार इस बार सबसे अधिक महंगाई गरी गोला और किशमिश में देखने को मिली है। गरी गोला की कीमत लगभग दोगुनी हो गई है, जबकि किशमिश के भाव भी पहले की तुलना में काफी बढ़ गए हैं। इसके अलावा नारियल, मखाना, दाख, सिंघाड़े का आटा और अन्य व्रत सामग्री भी महंगी हो गई है। सेमरियावां, बाघनगर, उसरा शहीद, सेहुड़ा, दानोकुइयां, दुधारा, चिउटना, सालेहपुर, नव्वागांव और लोहरौली समेत आसपास के बाजारों में इन दिनों व्रत सामग्री की अच्छी मांग है। सावन के सोमवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं, जबकि कई लोग पूरे महीने उपवास करते हैं। ऐसे में बढ़ी हुई कीमतों ने आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है।

महंगाई का असर खरीदारी के तरीके पर भी दिखाई दे रहा है। पहले जहां लोग एक-एक किलो सामग्री खरीदते थे, अब अधिकांश ग्राहक आधा किलो या 250 ग्राम खरीदकर ही काम चला रहे हैं। गृहिणियों का कहना है कि व्रत आस्था का विषय है, इसलिए कीमतें बढ़ने के बावजूद आवश्यक सामग्री खरीदना उनकी मजबूरी है। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि लगातार बारिश के कारण कई उत्पादों की आवक प्रभावित हुई है। दूसरी ओर सावन में मांग कई गुना बढ़ जाती है। इसी वजह से मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन पैदा हुआ, जिससे कीमतों में तेजी आई है। श्रद्धालुओं का कहना है कि महंगाई ने व्रत का बजट जरूर बिगाड़ दिया है, लेकिन भगवान शिव के प्रति उनकी आस्था में कोई कमी नहीं आई है। ऐसे में लोग अपनी क्षमता के अनुसार खरीदारी कर धार्मिक परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं।