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मध्य प्रदेश: लाचार, दिव्यांग, बेबस और गरीबों पर दिखाया गुना पुलिस ने वर्दी का रौब
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: गुना में न्याय की गुहार लगा रहे दलित परिवार से हनुमान चौराहे पर पुलिस ने की अभद्रता। कोतवाली और यातायात टीआई ने की दिव्यांग के परिजनों से धक्का-मुक्की, हाथ-पैर पकड़कर सड़क पर खींचा।
विस्तार
मध्य प्रदेश: गुना में न्याय की गुहार लगा रहे दलित परिवार से हनुमान चौराहे पर पुलिस ने की अभद्रता। कोतवाली और यातायात टीआई ने की दिव्यांग के परिजनों से धक्का-मुक्की, हाथ-पैर पकड़कर सड़क पर खींचा। पीड़ित परिवार ने कैन्ट पुलिस की संदिग्ध कार्यशैली पर भी लगाए सवालिया निशान। दरअसल, हम आपको बता दें कि सारा मामला एक गरीब अहिरवार परिवार से जुड़ा है, जहां प्रशासन और पुलिस की गलत कार्रवाई का शिकार हुआ लक्ष्मण अहिरवार नाम का दिव्यांग व्यक्ति, जो पूर्व में बिना जुर्म किए डेढ़ माह की जेल की सजा काट चुका है। जिसके कारण लक्ष्मण का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और वह ब्रेन हेमरेज से ग्रसित हो गया। इसी को लेकर लक्ष्मण के परिवार जनों ने प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई। मंगलवार जनसुनवाई से लेकर पुलिस प्रशासन के हर दरवाजे पर न्याय मांगा। मगर शासन-प्रशासन के कान में जूं तक नहीं रेंगी। प्रशासन ने वहां से भी खानापूर्ति कर उल्टे पांव चलता कर दिया। इसके बाद जब पीड़ित लक्ष्मणसिंह को पलंग पर लिटाकर अहिरवार समाज के लोग शनिवार 22 फरवरी 2025 को शांति पूर्वक हनुमान चौराहे पर धरना प्रदर्शन कर अपनी बात रखना चाह रहे थे, कि वह भी नहीं हो पाया, क्योंकि पुलिस वालों को तो अपनी रंगदारी दिखानी थी। लक्ष्मण के परिवार वालों का कहना था कि जो दबंग कॉलोनाइजर हैं, जिन्होंने उनको झूठा फंसाया था, उन पर एफआईआर दर्ज हो और उसके इलाज का सारा खर्चा प्रशासन उठाए। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उसके घर में अब कमाने वाला कोई नहीं है, तो उसके लड़के को सरकारी नौकरी में स्थान दिया जाए। इन्हीं मुद्दों को लेकर हनुमान चौराहे पर धरना दिया और चक्का जाम करने की कोशिश की, तो पुलिस प्रशासन के जवानों ने, जिनमें सिटी कोतवाली टीआई ब्रजमोहन सिंह भदोरिया, यातायात टीआई अजय प्रताप सहित कैन्ट और कोतवाली पुलिस के सब इंस्पेक्टर तथा अन्य जवानों ने उंगली दिखाई और उन्हें धक्का-मुक्की कर सबको वहां से सड़क पर खींचतान करते हुए चलता कर दिया। गुना पुलिस का इस तरह का अमानवीय रूप पहली बार देखने को मिला, क्या इसी को रक्षक कहते हैं। इस घटना ने इतना बड़ा रूप ले लिया, लेकिन फिर भी न कोई राजनीतिक दल और न ही प्रशासन का जिम्मेदार अधिकारी जवाब देने को तैयार है, क्या इसी को न्याय कहते हैं। ये है पूरा मामला। इस पूरे घटनाक्रम में दिव्यांग लक्ष्मणसिंह को गहरा मानसिक आघात लगा, जिसके चलते वह आज कोमा में पहुंच जाने के कारण बोलने में असमर्थ हैं, जिसकी हालत गंभीर बनी हुई है। पीड़ित के पुत्रों ने कैन्ट पुलिस की संदिग्ध कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाए हैं कि जब उनके पिता निर्दोष साबित हुए हैं, तो फर्जी एफआईआर कराने वाले दोषी कॉलोनाइजर शिशुपाल रघुवंशी, अंशुल सहगल, दीपक श्रीवास्तव सहित अन्य आरोपियों पर मामला दर्ज क्यों नहीं किया जा रहा।
गुना। कैन्ट और प्रदेश सरकार एक ओर जहां दलित उत्थान की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर पुलिस प्रशासन के आला अधिकारियों ने सरकार की छवि धूमिल करने में लगे हुए हैं। इसका परिणाम गरीब, लाचार, वेवश और दलित-आदिवासी लोगों का विश्वास सरकार से उठता जा रहा है। उनकी जुबान पर बस एक ही सवाल है कि भाजपाराज में गरीबों पर अत्याचार किए जा रहे हैं।
ये है पीड़ित परिवार की मांग।
जिले के कैन्ट थाने का है, जहां गत वर्ष दबंग भूमाफियाओं ने सांठगांठ कर निर्दोष लोगों पर झूठी एफआईआर कर दी। इसके तुरंत बाद ही दबाव में आकर तत्कालीन कैन्ट टीआई दिलीप राजौरिया ने एक दलित दिव्यांग लक्ष्मणसिंह अहिरवार को पकड़कर जेल भेज दिया। बस पूरी कहानी यहीं से शुरू होती है और लक्ष्मणसिंह ने जेल से बाहर आकर मामले की सच्चाई उजागर करने के लिए जांच कराई, तो वह इसमें निर्दोष साबित हुए।
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