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उत्तर प्रदेश: सत्य, बलिदान व अन्याय के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक है मुहर्रम, 10वीं का ताजिया जुलूस कल

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उत्तर प्रदेश  Published by: Anand Kumar (UP) , उत्तर प्रदेश  Edited By: Kunal, Date: 25/06/2026 10:21:58 am Share:
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  • Edited By.: Kunal,
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है. यह सत्य, बलिदान और अन्याय के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक माना जाता है. मु हर्रम की 10वीं तारीख (यौम-ए-आ शूरा)को कल शुक्रवार को ताजिया जुलूस निकाली जाएगी.

विस्तार

उत्तर प्रदेश: मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है. यह सत्य, बलिदान और अन्याय के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक माना जाता है. मु हर्रम की 10वीं तारीख (यौम-ए-आ शूरा)को कल शुक्रवार को ताजिया जुलूस निकाली जाएगी. इस्लामिक इतिहास और भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति में मुहर्रम और ताजिया का गहरा संबंध है.मु हर्रम वह महीना है जिसमें पैगंबर मोहम्मद के नवासे (नाती) हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथी कर्बला के मैदान में शहीद हुए थे और ताजिया इस शहादत और उनके पवित्र दरगाह/ मकबरे का एक प्रतीकात्मक रूप है जिसे लोग मु हर्रम के दौरान याद के तौर पर बनाते है. ताजिया मूल रूप से अरबी भाषा के शब्द अजा से बना है, जिसका अर्थ होता है- शोक मनाना, सांत्वना देना या किसी मृत व्यक्ति को याद करना. धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भ में, ताजिया बांस की खपच्चियों, रंग-बिरंगे कागजों, पन्नी और कपड़ों की मदद से बनाया गया एक बेहद खूबसूरत ढांचा या मॉडल होता है। 

मुहर्रम में ताजिया निकालने की परंपरा अरब देशों या इराक से शुरू नहीं हुई थी, बल्कि इसकी शुरुआत भारत (हिंदुस्तान) से हुई थी. इसका श्रेय 14वीं शताब्दी के क्रूर शासक तैमूर लंग को जाता है. तैमूरी राजवंश का संस्थापक तैमूर लंग इमाम हुसैन का बहुत बड़ा मुरीद था. वर्ष 1398 के आसपास जब वह भारत पर आक्रमण किया, तो मु हर्रम के दिनों में वह भारत में ही था और बीमार होने के कारण वह इराक नहीं जा सका. वह इस बात से बेहद उदास हो गया. तैमूर की उदासी दूर करने के लिए दरबार के कलाकारों ने कर्बला में बने इमाम हुसैन के मकबरे का एक हूबहु ढांचा बनाकर तैमूर के महल में रख दिया. तैमूर ने उस ढांचे को ताजिया नाम दिया और उसे फौज व आम जनता के सामने प्रदर्शित किया. इसके बाद से ही भारत में मुहर्रम के दिनों में इमाम हुसैन की याद में ताजिया बनाने और उसे सड़कों पर जुलूस या यादगार के रूप में निकालने की परंपरा शुरू हो गई। 

मुहर्रम के पहले दिन से ही लोग अपने घरों या इमामबाड़ों/ शोक सभा के स्थानों में इन ताजियों को स्थापित करते हैं. मुहर्रम की पहली से नवीं तारीख तक लोग इसके सामने बैठकर मजलिस करते हैं, कर्बला का दर्दनाक इतिहास सुनते हैं और इमाम हुसैन की शहादत पर आंसू बहते हैं. मुहर्रम की 10वीं तारीख यौम- ए- आशूर को इन सभी ताजियों को एक बड़े जुलूस के रूप में शहर भर में घुमाया जाता है. इस दौरान लोग या हुसैन का नारा लगाते हैं और अंत में इन ताजियों को स्थानीय कर्बला या कब्रिस्तान मे ले जाकर पूरे अदब और सम्मान के साथ दफन या ठंडा कर दिया जाता है. भारत में ताजिया सिर्फ मुस्लिम समुदाय तक सीमित नहीं रहा है. इतिहास गवाह है कि हिंदू समाज के कई शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के लोग भी मन्नतें पूरी होने पर ताजिया बनाते हैं. यह भारत की गंगा -जमुनी तहजीब का एक बड़ा उदाहरण है। 

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