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उत्तर प्रदेश: बोड़ाकी रेलवे टर्मिनल परियोजना में 1365 परिवारों का सहमति से पुनर्वास किया गया
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संक्षेप
उत्तर प्रदेश: दिल्ली-एनसीआर में तेजी से बढ़ते रेल यातायात के दबाव को कम करने के लिए ग्रेटर नोएडा के बोड़ाकी रेलवे स्टेशन को एक बड़े रेलवे टर्मिनल के रूप में विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम तेज हो गया है।
विस्तार
उत्तर प्रदेश: दिल्ली-एनसीआर में तेजी से बढ़ते रेल यातायात के दबाव को कम करने के लिए ग्रेटर नोएडा के बोड़ाकी रेलवे स्टेशन को एक बड़े रेलवे टर्मिनल के रूप में विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम तेज हो गया है। प्रस्ताव के मुताबिक यहां 13 रेलवे स्टेशन और 63 रेलवे लाइनों का विशाल नेटवर्क तैयार किया जाएगा, जो इसे दिल्ली के आनंद विहार टर्मिनल का मजबूत विकल्प बना सकता है। लेकिन इस परियोजना का सबसे संवेदनशील पहलू है—विस्थापन। इस योजना के तहत सात गांवों के 1365 परिवारों को पुनर्वासित किया जाएगा। प्रभावित गांवों में चमरावली बोड़ाकी, पल्ला, कठेहरा, दादरी, पाली, तिलपता कनारवास और चमरावली रामगढ़ शामिल हैं। प्रशासन ने इन परिवारों को शिव नादर विश्वविद्यालय के पीछे, दतावली गांव के उत्तर में अंसल प्रोजेक्ट के पास बसाने की योजना बनाई है। खास बात यह है कि प्रभावित लोगों को जमीन के बदले जमीन के साथ-साथ मकान निर्माण की लागत भी दी जाएगी। आमतौर पर ऐसी परियोजनाओं में विरोध और टकराव देखने को मिलता है, लेकिन यहां तस्वीर अलग है। अधिकांश प्रभावित परिवार इस प्रस्ताव से सहमत नजर आ रहे हैं। यह सहमति अचानक नहीं बनी, बल्कि इसके पीछे लगातार संवाद, भरोसा और स्थानीय स्तर पर मजबूत नेतृत्व की भूमिका रही है। करीब एक वर्ष पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधान परिषद सदस्य नरेंद्र सिंह भाटी ने इस मुद्दे को सिर्फ एक परियोजना नहीं, बल्कि अपने “अठगइया” परिवार के अस्तित्व से जुड़ा विषय बताया था। उन्होंने पाली, पल्ला, बोड़ाकी, दतावली, कठेहड़ा, बील, नई बस्ती और चिटेहरा को अपना परिवार मानते हुए लोगों से सीधे संवाद शुरू किया। उन्होंने न सिर्फ गांव-गांव जाकर लोगों की चिंताओं को समझा, बल्कि मुआवजा दर बढ़ाने और बेहतर पुनर्वास की मांग को सरकार और प्राधिकरण तक मजबूती से रखा। प्राधिकरण और नेतृत्व का तालमेल 1 अप्रैल को ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण के CEO एन. जी. रवि कुमार की ओर से मिली जानकारी ने साफ कर दिया कि इस पूरे मामले में प्रशासन, रेलवे और स्थानीय नेतृत्व के बीच बेहतर समन्वय बना है। प्राधिकरण का रुख भी प्रभावित परिवारों के प्रति सकारात्मक रहा है और मुआवजा दर बढ़ाने पर सहमति बनी है। आज हालात यह हैं कि अधिकांश परिवार पुनर्वास के लिए तैयार हैं। यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, क्योंकि आमतौर पर ऐसी परियोजनाओं में लंबे समय तक संघर्ष और विरोध चलता है।
अगर यह परियोजना तय समय में पूरी होती है, तो इसका श्रेय सिर्फ सरकार और प्राधिकरण को ही नहीं, बल्कि उस नेतृत्व को भी जाएगा जिसने जमीन पर भरोसा कायम किया और संवाद के जरिए समाधान निकाला।
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