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उत्तर प्रदेश: रक्षाबंधन पर नहीं रहेगा भद्रा का साया, 28 अगस्त को दिनभर बांधी जा सकेगी राखी
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संक्षेप
उत्तर प्रदेश: रक्षाबंधन भाई- बहन का पवित्र त्यौहार है. इस दिन बहन भाई की कलाई में राखी बांधती है और भाई बहन की रक्षा करने का वचन देता है. हिंदू पंचांग के अनुसार सावन मास की पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है
विस्तार
उत्तर प्रदेश: रक्षाबंधन भाई- बहन का पवित्र त्यौहार है. इस दिन बहन भाई की कलाई में राखी बांधती है और भाई बहन की रक्षा करने का वचन देता है. हिंदू पंचांग के अनुसार सावन मास की पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है. इस बार भाई- बहन के अटूट-प्रेम और स्नेह का पर्व 28 अगस्त दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रक्षाबंधन के त्यौहार का प्रारंभ खुद माता लक्ष्मी ने किया था. माता ने एक अनोखे वादे के कारण राजा बलि के हाथ में पहली राखी बांधी थी.श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, राजा बलि बहुत पराक्रमी और दानवीर राजा थे. उन्होंने अपने तपोबल और पराक्रम से तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया था. इससे भयभीत होकर देवराज इंद्र भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे. तब देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और वह राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे. बलि ने यज्ञ में आए वामन देव से मनचाहा दान मांगने को कहा। जिस पर वामन देव ने केवल तीन पग भूमि देने की मांग की. जब राजा बलि इतनी भूमि देने के लिए तैयार हो गए तब वामन देव ने अपना विशाल रूप धारण किया और उन्होंने दो पग में ही पूरी पृथ्वी,आकाश और स्वर्ग लोक नाप लिया. जब तीसरा पग रखने के लिए कुछ नहीं बचा तब राजा बलि ने अपना सिर ही वामन देव की चरणों में रख दिया. बलि की इस भक्ति और दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राजा बना दिया. साथ ही भगवान विष्णु ने बलि से वरदान मांगने को कहा, तब राजा बलि ने एक अत्यंत अनोखा वादा मांग लिया. बाली ने कहा कि हे प्रभु मुझे वरदान दीजिए कि जब भी मैं सुबह उठूं या रात को सोऊं, आप हमेशा मेरे सामने रहें. मेरी इच्छा है कि आप मेरे पाताल लोक के द्वारपाल बनकर रहें. इसके बाद भगवान विष्णु बैकुंठ धाम छोड़कर पाताल लोक में राजा बलि के द्वारपाल बनकर रहने लगे. भगवान विष्णु के बैकुंठ धाम छोड़ने से माता लक्ष्मी अत्यंत दुखी रहने लगीं. तब उन्होंने प्रभु को वापस लाने की एक योजना बनाई. उस योजना के तहत माता लक्ष्मी एक साधारण स्त्री का रूप धारण करके पाताल लोक पहुंची. उन्होंने राजा बलि को अपना भाई माना और श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि की कलाई पर एक रक्षासूत्र बांध दिया। साथ ही उन्होंने राजा बलि के लंबे और सुखद जीवन की प्रार्थना की. यह देख राजा बलि का दिल स्नेह और करुणा से भर गया. इसके बाद राजा बलि ने अपने धर्म बहन से कुछ मांगने के लिए कहा. तब माता लक्ष्मी अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर बोलीं, हे राजन- मुझे धन दौलत कुछ नहीं चाहिए, सिर्फ मेरे स्वामी मुझे लौटा दो. राजा बलि ने माता लक्ष्मी द्वारा बांधे गए पवित्र धागे का मान रखा और तुरंत भगवान विष्णु को अपने उसे अनोखे वादे से मुक्त कर दिया, जिसके तहत उन्होंने भगवान को अपना द्वारपाल बना लिया था. इसके बाद माता लक्ष्मी भगवान विष्णु को लेकर बैकुंठ धाम वापस आ गईं. कहा जाता है कि इस घटना के बाद से ही राखी पर्व मनाया जाने लगा. इस साल राखी बांधने के लिए किसी विशेष मुहूर्त का इंतजार नहीं करना होगा. पूरे दिन रक्षाबंधन मनाया जा सकेगा. इसी दिन लगने वाला खंड चंद्र ग्रहण का भी भारत में असर नहीं रहेगा, क्योंकि यह यहां दिखाई नहीं देगा. ऐसे में इसका सूतक काल भी मान्य नहीं होगा और धार्मिक व मांगलिक कार्य सामान्य रूप से किए जा सकेंगे. सोनभद्र जिले के दुद्धी संकट मोचन मंदिर के पुजारी पं. कल्याण मिश्र तथा धनौरा गांव के पुरोहित पं. त्रिभुवन तिवारी ने संयुक्त रूप से बताया कि इस बार रक्षाबंधन भद्रा काल से मुक्त रहेगा. 27 अगस्त को सुबह 9:08 बजे से शुरू होने वाला भद्रा काल रात 9:32 बजे समाप्त हो जाएगा. इसके बाद 28 अगस्त को रक्षाबंधन मनाने में भद्रा की बाधा नहीं रहेगी. पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त को सुबह 9:08 बजे शुरू होगी और 28 अगस्त को सुबह 9:48 बजे समाप्त होगी। हालांकि, उदय तिथि और कुलाचार के अनुसार रक्षाबंधन पूरे दिन मनाया जा सकता है।
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