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उत्तर प्रदेश: जलभराव से फसल बर्बाद, किसान पलायन को मजबूर
 

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उत्तर प्रदेश  Published by: Ramkesh Vishwakarma , उत्तर प्रदेश  Edited By: Kunal, Date: 18/04/2026 04:03:38 pm Share:
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  • Published by.: Ramkesh Vishwakarma ,
  • Edited By.: Kunal,
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  • 18/04/2026 04:03:38 pm
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: जनपद गाजीपुर के मुहम्मदाबाद और बलिया की सीमा पर बसा 'करईल' क्षेत्र, जो कभी अपनी उपजाऊ मिट्टी और लहलहाती फसलों के लिए मशहूर था।

विस्तार

उत्तर प्रदेश: जनपद गाजीपुर के मुहम्मदाबाद और बलिया की सीमा पर बसा 'करईल' क्षेत्र, जो कभी अपनी उपजाऊ मिट्टी और लहलहाती फसलों के लिए मशहूर था। आज किसानों की बेबसी और सरकारी तंत्र की अनदेखी का गवाह बन रहा है। मुहम्मदाबाद क्षेत्र के राजापुर सहित दर्जनों गाँवों में मंगई नदी का जलस्तर किसानों के लिए वरदान नहीं, बल्कि काल साबित हो रहा है। सूनी फसलें, खाली पड़े खेत और कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की टूटती उम्मीदें आज एक बड़े पलायन का संकेत दे रही हैं। इस तबाही की पटकथा तब लिखी गई जब शारदा सहायक नहर का अतिरिक्त पानी बिना किसी ठोस योजना के मंगई नदी में छोड़ दिया गया। किसानों का आरोप है कि जलभराव के कारण जो बुवाई अक्टूबर के अंत तक पूरी हो जानी चाहिए थी। वह जनवरी तक खिंच गई। "फसल चक्र पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। जिस पौधे को पकने के लिए 130 दिन चाहिए थे। उसे बमुश्किल 70-80 दिन मिले। ऊपर से समय से पहले बढ़ते तापमान ने रही-सही कसर पूरी कर दी।" मृत्युंजय राय उर्फ बुल्लू राय, किसान।


उत्पादन में भारी गिरावट जहाँ प्रति बीघा औसत पैदावार 10-12 कुंतल होती थी, वहां अब मात्र 2 से 3 कुंतल गेहूं निकल रहा है। फसल इतनी छीदी और खराब है कि मजदूर कटाई के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि फसल की कुल कीमत से अधिक उसकी कटाई की मजदूरी बैठ रही है। हजारों हेक्टेयर भूमि जलभराव के कारण बोई ही नहीं जा सकी, जो आज भी बंजर और सूनी दिखाई दे रही है। राजापुर के किसान सतीश चंद्र राय, विमल कुमार राय और कृपा शंकर राय का कहना है कि यह समस्या साढ़े तीन दशकों से चली आ रही है, लेकिन हाल के वर्षों में 'विकास' ने इसे और विकराल बना दिया है।  पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे और ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे के निर्माण के बाद मंगई नदी के प्राकृतिक जल निकासी का रास्ता संकुचित हो गया है।

 नदी में गाद (सिल्ट) जमा होने और झाड़ियों के कारण गहराई कम हो गई है, जिससे अतिरिक्त पानी तुरंत खेतों में फैल जाता है। हाटा, सोनवानी, राजापुर, दौलतपुर, टुटुवारी और बघौना जैसे गाँवों की हजारों हेक्टेयर भूमि अब खेती के अयोग्य होती जा रही किसानों की मुख्य मांगें: "समाधान नहीं तो खेती नहीं" कैलाश राय, कृष्ण गोपाल राय, रणजीत राय, प्रेमनाथ राय, रामजतन राय और सरोज राय ने शासन-प्रशासन से आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उनकी मांगें स्पष्ट हैं। मंगई के किनारे बसे इन गाँवों में केवल खेत ही खाली नहीं हैं, बल्कि किसानों की आंखों के सपने भी सूख चुके हैं। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो करईल की यह स्वर्णिम भूमि केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज रह जाएगी और यहाँ का युवा खेती छोड़कर शहरों में मजदूरी करने को मजबूर होगा। प्रशासन की चुप्पी और किसानों की चित्कार के बीच, अब सवाल यह है कि 'विकास' की इस दौड़ में अन्नदाता आखिर कब तक अपनी बलि देता रहेगा?